फिल्म : आर्टिकल 15
निर्देशक: अनुभव सिन्हा
अभिनय: आयुष्मान खुराना, कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा
संगीत: अनुराग सैकिया, मंगेश धाकड़े
अवधि : 131 मिनट
युवा कथाकार गौरव सोलंकी और निर्देशक अनुभव सिन्हा ने संविधान के पन्ने पलटते फिल्म आर्टिकल 15 की एक ऐसी पटकथा लिखी है जिस से हम परिचित तो हैं लेकिन व्यवहार में अमल नहीं करते। वैसे भी इस देश की अधिकतम आबादी को तो संविधान की न्यूनतम जानकारी भी नहीं है। उसे नहीं पता कि आर्टिकल 15 में क्या है । वैसे भी माना जाता है कि केवल कानून बनने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि जब तक उसे समाज में व्यावहारिक में न उतारा जाए। लेकिन यह अच्छी बात है कि फिल्मों के माध्यम से आम लोगों में जागरूकता जरूर लाई जा सकती है।
अनुभव सिन्हा बेहतरीन निर्देशक के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। इससे पहले वह मुल्क बना चुके हैं। इस फिल्म में दिखाया गया है कि मात्र ₹3 की दिहाड़ी बढ़ाने को लेकर दो दलित लड़कियों का गैंग रेप हो जाता है और उन्हें मार कर पेड़ पर लटका दिया जाता है। संयोग से तीसरी लड़की भाग निकलती है। समाज के ताकतवर लोग दलितों को सजा के तौर पर इस तरीके का व्यवहार उनके साथ करते हैं ताकि यह लोग अपनी औकात में रहें। दुर्भाग्य से ताकतवर लोग उन बच्चियों के पिता को ही दोषी मानकर उन्हें जेलों में जेल में बंद कर देते हैं। जब उन लड़कियों के पिता कहते हैं कि मारने की क्या जरूरत थी, कुछ दिन अपने पास रख कर छोड़ देते तो समूची मानवता शर्मसार होती है और एक पिता की बेबसी और लाचारी को देखकर हम सोचते हैं कि आखिर हम किस उन्नति की बात करते हैं या फिर हम कौन से अत्याधुनिक होने का दावा करते हैं। इन सब के बीच ईमानदार पुलिस अधीक्षक अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) पूरी मनुष्यता और संवेदनशीलता के साथ इस केस पर से पर्दा उठाने की कोशिश करता है कि असली दोषी कौन है? तो तमाम बदतर हालातों के बीच हमें उम्मीद की एक किरण इसी समाज में दिखाई देने लगती है। लेकिन यहां सवाल यह है कि हमारे समाज में अयान जैसे ईमानदार लोग कितने हैं? जिसको न सस्पेंड होने का डर है और न ही खुद कीचड़ में उतर कर गंदगी साफ करने से परहेज। उसे कदम कदम पर बजबजाते तंत्र का मुकाबला करना है। अपने ही भ्रष्ट पुलिस महकमे से लड़ना है। धार्मिक उन्मादी लोगों का पर्दाफाश करना है और जात-पात के भेदभाव के बिना असली गुनहगार को पकड़ कर उसे सजा दिलवानी है।
आयुष्मान खुराना के अभिनय को देखकर लगता है कि वे सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते कामयाबी के शिखर पर खड़े नजर आते हैं। वही मनोज पाहवा और कुमुद मिश्रा का काम भी शानदार है। इस फिल्म में एक अच्छी बात यह लगी कि आयुष्मान खुराना अपने मोबाइल फोन पर लगातार अपनी प्रेमिका से अपनी परेशानियों को साझा ही नहीं करते उसकी सलाह पर कुछ नए कदम भी उठाते हैं। जिससे फिल्म में रोचकता भी बनी रहती है और एकरसता भी नहीं आती।
इसका गीत संगीत बेहद मार्मिक है जो फिल्म की शुरुआत में लोकगीत बजता है वह पहले ही काफी लोकप्रिय हो चुका है। हां, बेटियों की विदाई का गीत उस समय फिल्म में आता है जब मजबूर पिता अपनी मृत बेटियों के शवों को ले जाते हैं तो आंखें नम जरूर होती हैं।
यह फिल्म इस ओर भी इशारा करती है कि हमारे सिस्टम में चाहे कितनी भी जंग क्यों न लग गई हो लेकिन कभी-कभार अयान जैसे ईमानदार अफसर उम्मीद की किरण बनकर सामने आ ही जाते हैं।
इस फिल्म की खासियत यह भी है कि हॉल से बाहर निकल कर भी यह आपके दिलो-दिमाग पर इस तरह छा जाती है कि आपको कई दिनों तक अपनी गिरफ्त में ले लेती है और आप सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि काश सचमुच में हम अपने संविधान को समझे, जाने और अमल करें। केवल ज्ञान न बघारे और ना ही कोरे उपदेश, बल्कि समाज में एक कदम आगे बढ़ाए और मनुष्यता को बचाने में मददगार बने।
©Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof (DU)

Very good movie...
ReplyDeleteWell written