बहन के नाम सोनिया का पत्र
फिल्म : लव सोनिया
निर्देशक : तबरेज़ नूरानी
अभिनय : मृणाल ठाकुर, फ्रीडा पिंटो, मनोज वाजपेयी, ऋचा चड्ढा, राजकुमार राव, अनुपम खेर, रिया सिसोदिया, आदिल हुसैन, साइ ताम्हणकर आदि
संगीत : नील्स बाय नेल्सन
अवधि : 127 मिनट
सर्टिफिकेट : U / A
रेटिंग : 4 स्टार
बतौर निर्देशक तबरेज़ नूरानी की यह पहली ही फिल्म है। हालांकि इस थीम पर बेस्ड पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं लेकिन इसका ट्रीटमेंट बिल्कुल नया है। यह फिल्म मानव ट्रेफिककिंग पर आधरित है। चूंकि यह फिल्म एक सत्य घटना पर आधारित है। यह फिल्म हमें एक ऐसी बदनाम और अंधेरी दुनिया में ले जाती है जहां पहुंचकर हम न केवल सिहर उठते हैं बल्कि कहीं न कहीं इस समाज के वीभत्स चेहरे को देखकर हम असुरक्षित भी महसूस करने लगते हैं। इस नारकीय दुनिया में न कहीं मनुष्यता दिखाई देती है, न संवेदना और न ही प्रेम। केवल और केवल कुछ लोगों की अमानवीयता, देह की हबस और नृशंसता ही चारों ओर दिखाई देती है।
मुंबई से 1400 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव में एक किसान शिवा (आदिल हुसैन) पत्नी और दो बेटियों— सोनिया (मृणाल ठाकुर) और प्रीति (रिया सिसोदिया) के साथ रहता है। वह सिर से पैर तक दादा ठाकुर (अनुपम खेर) के कर्ज में डूबा हुआ है। एक दिन मजबूर होकर वह अपनी बड़ी बेटी प्रीति को चंद रुपयों में दादा ठाकुर को बेच देता है और घरवालों को कुछ नहीं बताता। लेकिन छोटी बहन सोनिया कड़ा विरोध करती है और प्रीति को ढूंढने निकल पड़ती है। इसी क्रम में सानिया भी दादा ठाकुर के चंगुल में फंस जाती है और गांव से पहले मुंबई होती हुई हांगकांग और फिर लॉस एंजेल्स तक पहुंच जाती है। प्रीति को ढूंढने के क्रम में सानिया इस दलदल में फंसती चली जाती है। वह मुंबई एक कोठे पर पहुंचा दी जाती है जिसका मालिक फैजल (मनोज वाजपेयी) है। सोनिया वहां से एक बार भागने की भी कोशिश करती है लेकिन पकड़ी जाती है। उसकी मुलाकात एक एनजीओ में काम करने वाले मनीष (राजकुमार राव) से होती है। मनीष उसे उस दलदल से निकालना भी चाहता है लेकिन वह प्रीति को ढूंढने के चक्कर में आजाद नहीं होना चाहती है। इसी कोठे में उसे ऋचा चड्ढा और फ्रीडा पिंटो मिलती हैं। फैजल सोनिया को ज्यादा कीमत में बेचने के चक्कर में उसे हांगकांग के किसी आदमी को बेच देता है जिसे वहां से भी लॉस एंजेल्स में बेच दिया जाता है। इस क्रम में लड़कियों के सौदागर इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि सानिया का कौमार्य भंग न होने पाए लेकिन इसके बदले उसे अप्राकृतिक ढंग से हबस का शिकार होना पड़ता है, जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
मृणाल ठाकुर की यह पहली ही फिल्म है लेकिन उनके काम को देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह उनकी पहली फिल्म है। हालांकि वह छोटे पर्दे पर काम कर चुकी हैं। उन्होंने सानिया के रूप में परकाया प्रवेश कर लिया है। उनके चहरे के हाव—भाव, मासूमियत, डॉयलॉग डिलीवरी तक एक भी क्षण ऐसा नहीं लगता कि वह अभिनय कर रही हैं। उन्होंने बेहतरीन और शानदार काम किया है। मनोज वाजपेयी का जो किरदार है, उनके प्रति नफरत होना सहज स्वाभाविक है। फ्रीडा पिंटो, ऋचा चड्डा, साइ ताम्हणकर, रिया सिसोदिया का काम भी विश्वासनीय और सहज लगता है। पिता की भूमिका में आदिल हुसैन का काम भी बढ़िया है कि कैसे एक पिता अपनी बेटी को बेचने के लिए मजबूर होता है। लेकिन सोनिया को वह इस दलदल में ढकेलना नहीं चाहते थे इसलिए जब वह बिना बताए चली जाती है तो वह उसकी एक फोटो के सहारे उसे ढूंढने निकल पड़ते हैं। बाकी कलाकारों का काम भी सराहनीय है।
ऐसी डार्क फिल्मों में जितनी मेहनत और रिसर्च की जरुरत होनी चाहिए, वह तबरेज़ नूरानी के निर्देशन में दिखाई पड़ती है। उन्होंने छोटे—से—छोटे दृश्य में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है। समाज का ऐसा घिनौना चेहरा वे दर्शकों के सामने लेकर आए हैं जो आपको भीतरी तह तक ले तो जाता है लेकिन इससे बाहर निकलने में आपको बहुत वक्त लग सकता है।
यदि आप केवल मनोरंजन फिल्में देखने के शौकीन हैं तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। क्योंकि यह फिल्म हमें मर्दों की ऐसी दुनिया में ले जाती है जहां औरत सिर्फ एक भोग्या है और कुछ नहीं। लेकिन यह तबरेज़ नूरानी की अतिरिक्त विशेषता कही जाएगी कि ऐसी दलदल में भी सोनिया में मन में उम्मीद और आशा की किरण कभी खत्म नहीं होती इसलिए वह अपनी बहन प्रीति को पत्र लिखकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करती है।
—साधना अग्रवाल
Assistant Professor & Film Critic
Delhi University
Email: agrawalsadhna2000@gmail.com

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