अकथ कहानी प्रेम की
फिल्म : लैला मजनू
निर्देशक : साजिद अली
अभिनय : अविनाश तिवारी, तृप्ति डिमरी, सुमित कौल,परमीत सेठी, मीर सरवर
संगीत : निलाद्री कुमार, जोई बरुआ
गीत : इरशाद कामिल
अवधि : 140 मिनट
रेटिंग : 1 .5
स्टार
एक लंबे अरसे से किसी भी प्रेमी जोड़े के प्यार को परखने और उदाहरण देने के लिए लैला—मजनू, शीरी—फरहाद, हीर—रांझा के उदाहरण दिए जाते रहे हैं। इम्तियाज अली के भाई साजिद अली की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है। कहने को तो यह आज के जमाने की प्रेम कहानी है लेकिन कश्मीर की खूबसूरती के अलावा इसमें कुछ भी नया नहीं है। कहानी बेहद लचर और ढीली—ढाली है। जैसा कि अमूमन होता है कि किसी भी प्यार करने वालों के बीच उनका परिवार उनका दुश्मन बनकर सामने खड़ा हो जाता है और प्यार करने वालों को तमाम मुश्किलों और मुसीबतों को लांघते हुए अपनी मंजिल पर पहुंचना होता है। कुछ नया दिखाने के चक्कर में साजिद अली ने लड़के से ज्यादा लड़की के चरित्र को नीचे गिरा दिया है।
जैसा कि एक आम प्रेम कहानी होती है, वैसा ही सब कुछ इसमें भी दिखाई देता है। लेकिन जो तनाव, कशिश, बैचेनी, अंतर्द्वंद्व, जुनून, लगाव,विद्रोह, अमीर—गरीब, उंचनीच आदि दिखाई देना चाहिए, वैसा कुछ भी नजर नहीं आता। लैला (तृप्ति डिमरी) शहर के एक सम्मनित व्यक्ति की बेटी है। उसे फ्लर्ट करना अच्छा लगता है और वह चाहती है कि लड़के उसके आगे—पीछे घूमें। इसी क्रम में कैस यानी अविनाश तिवारी और लैला का आमना—सामना होता है। दोनों अपने—अपने तरीके से टाइमपास करने के इरादे से मिलते हैं लेकिन न चाहते हुए भी उनका रिश्ता प्यार में बदल जाता है। दोनों शादी करना चाहते हैं लेकिन उन दोनों के प्यार में आड़े आता है उनका परिवार। दोनों परिवारों में 36 का आंकड़ा है। हालांकि कैस के पिता अपने बेटे की खुशी के लिए न केवल मान जाते हैं बल्कि शादी का पैगाम लेकर भी पहुंच जाते हैं। लेकिन लैला के पिता न केवल रिश्ता ठुकरा देते हैं बल्कि कैस के पिता का बहुत अपमान करते हैं और जिद में आकर लैला की शादी सुमित कौल से कर देते हैं। लैला भी अपने पिता और समाज की चिंता में हथियार डाल देती है और चुपचाप निकाह कर लेती है। कैस लंदन चला जाता है। चार साल बाद अपने पिता की मृत्यु पर जब वह वापस लौटता है तो वह मजनू बन चुका होता है। हालात करवट बदलते हैं। दोनो को एक बार फिर से मिलने की उम्मीद जगती है। कैस को लैला के लौटने का इंतजार है लेकिन वह इंतजार इतना लंबा हो जाता है कि वह पागलपन की हद तक पहुंच जाता है और अपनी जान दे देता है। बड़े ही नाटकीय ढंग से लैला की मृत्यु भी उसकी कब्र के बराबर में हो जाती है।
कैस से मजनू बने अविनाश तिवारी का काम बेहतरीन है। कमजोर और लचर कहानी के चलते भी उन्होंने उसे बखूबी संभाला है,खासकर फिल्म के आखिरी 1 घंटे में दर्शकों को उनसे हमदर्दी होने लगती है। उनके अभिनय को देखकर लगता ही नहीं कि यह उनकी पहली ही फिल्म है। वहीं तृप्ति डिमरी उतना असर नहीं छोड़ पातीं। क्योंकि एक तरफ उन्हें अति आधुनिक लड़की दिखाया गया है लेकिन वह बपने पिता को भी नहीं मना पातीं, न ही कोई कठोर कदम उठा पातीं हैं। चुपचाप एक आदर्श भारतीय नारी की तरह सब कुछ सहती चली जाती हैं। बाकी सह कलाकारों का काम ठीक—ठाक है।
इसके गीत—संगीत की यदि हम बात करें तो जाहिर है कि यह एक प्रेम कहानी है तो रोमांटिक गानों का होना सहज—स्वाभाविक ही है। हालांकि इनकी संख्या को थोड़ा कम किया जा सकता था क्योंकि इतने ढेर गानों के कारण फिल्म की लंबाई अनावश्यक रूप से ज्यादा हो गई है। फिर भी कुछ गाने बहुत अच्छे लगते हैं।
पुरानी कहानी को नए फ्लेवर में परोसने के चक्कर में साजिद अली कुछ भी नया नहीं दिखा सके। दर्शक इस फिल्म से कोई जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता क्योंकि वह एक उत्कृष्ट प्रेम कहानी देखने की गरज से फिल्म देखने जाता है लेकिन वह दिखाई न देकर एक औसत प्रेम कहानी देखकर खुद को ठगा सा महसूस करता है।
—साधना अग्रवाल
Email: agrawalsadhna2000@gmail.com


Nice review.
ReplyDeleteMovie boring
Ma'am you are a honest critic
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