Happy Phir Bhaag Jayegi: Film Review- 1/5

पकड़म- पकड़ाई का उबाऊ खेल


                               

फिल्म : हैप्पी फिर भाग जाएगी

निर्देशक : मुदस्सर अज़ीज़
अभिनय : सोनाक्षी सिन्हा, डायना पेंटी, जिम्मी शेरगिल, जस्सी गिल, पीयूष मिश्रा, अली फजल
संगीत :  सोहेल सेन
गीत :    मुदस्सर अज़ीज़
अवधि : 137 मिनट
रेटिंग :    1  स्टार

    
           वर्ष 2016 में आई फिल्म 'हैप्पी भाग जाएगी' का यह दूसरा भाग है, जो कि इसके नाम से ही पता चल जाता है। हालांकि पिछली फिल्म दर्शकों का थोड़ा मनोरंजन करने में कामयाब रही थी लेकिन इसके दूसरे पार्ट को देखकर लगता है कि निर्देशक ने इसे जबरदस्ती बना कर कोई भी कमाल नहीं किया, बेशक दर्शको का पैसा और समय दोनों ही बर्बाद किया है। एक और बात इसमें दो-दो हैप्पी के चक्कर में कंफ्यूजन ही ज्यादा पैदा किया है। इसके लोकेल को चीन ले जाकर कुछ नया करने की कोशिश में इसमें हास्य-व्यंग्य के नाम पर फूहड़ता ही ज्यादा दिखाई देती है। जहां पिछली फिल्म में डायना पेंटी अपनी मासूमियत और एक्टिंग के दम पर दर्शकों का थोड़ा बहुत मनोरंजन कर पाईं थीं, वहीं इसमें उनका किरदार बहुत छोटा कर दिया है और सोनाक्षी सिन्हा को ज्यादा फोकस किया गया है,जो बिल्कुल भी फिट नहीं बेठतीं।

         दरअसल इस फिल्म में हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) की शादी के दिन दूल्हे के भाग जाने के कारण शादी नहीं हो पाती, जिससे हैप्पी के बाऊजी टूट जाते हैं। हैप्पी अपने भगोड़े पति की तलाश में शांघाई जा पहुंचती है। इसी क्रम में  दूसरी हैप्पी ( डायना पेंटी) के कंफ्यूजन में उसको किडनैप कर लिया जाता है, चूंकि संयोग से उसी दिन दूसरी हैप्पी अपने पति गुड्डू (अली फजल) के साथ चीन पहुंचती है। 

सोनाक्षी सिन्हा उन चीनी अपहरण कर्त्ताओं के चंगुल से भागती-दौड़ती रहती है। इसमें उसका साथ देते हैं खुशवंत सिंह गिल यानी जस्सी गिल। बाद में दो साथी- एक हिंदुस्तानी-दमन सिंह बग्गा (जिम्मी शेरगिल) और दूसरा पाकिस्तानी-उस्मान (पीयूष मिश्रा) भी हैप्पी की मदद करने लगते हैं। हैप्पी और उसके साथी चीनी अपहरण कर्त्ताओं द्वारा बार-बार पकड़े जाते हैं और वे सभी उनके चंगुल से बार-बार भागते हैं। जबकि जिस हैप्पी की तलाश उन्हें है, वह दूसरी वाली है।

इस फिल्म का पहला भाग न केवल स्लो है बल्कि कंफ्यूजन भी पैदा करता है वहीं दूसरे हाफ तक आते-आते लोग इतने ऊब जाते हैं कि बेसब्री से फिल्म के खत्म होने का इंतजार करने लगते हैं लेकिन फिल्म है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। यह बात समझ से बिल्कुल परे है कि इसको इतना लंबा क्यों खींचा गया ? इसकी लंबाई इसकी सबसे बड़ी कमी है। बात-बात में गालियों के प्रयोग से यदि निर्देशक को यह भ्रम है कि वह लोगों को हॅसा सकता है तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी में है।डायना पेंटी अच्छी लगी हैं लेकिन उनके करने के लिए कुछ भी नहीं है। सोनाक्षी सिन्हा निराश करती हैं क्योंकि न तो उनकी काॅमिक टाइमिंग अच्छी है और न ही उनके अभिनय में कोई दम। जस्सी गिल और जिम्मी शेरगिल के बीच यह संवाद जरुर आपको अच्छा लग सकता है। जब जस्सी गिल कहते हैं- मैं गिल हूं गिल ऐसी कोई गल(बात) नहीं जो गिल को समझ न आए। उस पर जिम्मी शेरगिल कहते हैं- यदि तू गिल है तो मैं शेरगिल हूं।

     इसके गानों में भी पंजाबी तड़का लगाने के बाद भी कोई आकर्षण नहीं है। इसका गीत-संगीत बिल्कुल साधारण है।
      यदि आप सोनाक्षी सिन्हा के भी फैन हैं तो भी इससे आपको निराशा ही हाथ लगेगी। हां एक सवाल निर्देशक से जरुर पूछना पड़ेगा कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्हें हैप्पी को फिर से भगाना पड़ा, या कब तक वे हैप्पी को इस तरह भगाते रहेंगे।












 - साधना अग्रवाल
Assistant Professor & Film CriticDelhi University
Email: agrawalsadhna2000@gmail.com

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