असाधारण गणितज्ञ शकुंतला देवी का जिंदगीनामा

©साधना अग्रवाल


फिल्म : शकुंतला देवी
निर्देशक : अनु मेनन
अभिनय : विद्या बालन, सान्या मल्होत्रा, अमित साध, जिश्शु सेन गुप्ता
रेटिंग : 3.5 स्टार

     एक लड़की जो अपने मन की सुनती है और दिल खोलकर हंसती है, मर्दों के लिए उससे डरावना और क्या हो सकता है?  यह कहना है शकुंतला देवी का। जाहिर सी बात है कि ऐसे व्यक्तित्व वाली  लड़की को पुरुष प्रधान समाज बिल्कुल स्वीकार नहीं करता। लेकिन शकुंतला को समाज की जरा भी परवाह नहीं है। और यह बात कहने का साहस आज की स्त्री नहीं बल्कि आजादी से पहले के समय की एक  साधारण लड़की शकुंतला देवी कहती है। शकुंतला देवी का जन्म (1920 - 2013) एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। जहां वह देखती थी कि उसकी मां एक निर्जीव प्राणी की तरह बस अपना जीवन जी रही है। शकुंतला को शिकायत थी कि उसकी मां उसके अप्पा के आगे क्यों कुछ नहीं बोल पाती ? क्यों पूरी उम्र चुपचाप हर बात सहती रहती है? यही वजह है कि शकुंतला देवी का यह आक्रोश कब नफरत में बदल जाता है, पता ही नहीं लगता। शकुंतला यद्यपि कभी स्कूल नहीं गई लेकिन अंक गणितीय गणनाओं को चुटकियों में हल कर देती थी। अपनी इस विलक्षण प्रतिभा के चलते न केवल अपने गांव, राज्य, देश बल्कि पूरी दुनिया में उसका डंका बजने लगता है। और उसको भी यही दुनिया लुभाने लगती है। 
       उसकी इसी असाधारण प्रतिभा के कारण उसे मानव कंप्यूटर की उपाधि मिली। शकुंतला देवी के लिए दुनिया छोटी पड़ने लगी। वह शादी तो करती है, लेकिन अपनी शर्तों पर जीने वाली शकुंतला की शादी ज्यादा दिन तक नहीं चल पाती क्योंकि उसको आए दिन विदेशी दौरों पर जाना पड़ता था। उसने अपने पति परितोष बनर्जी (जिश्शु सेनगुप्ता) से जब साथ चलने के लिए कहा तो यहां फिर पुरुष का अहम् आड़े आ जाता है, जिस पर शकुंतला कहती है कि यदि यही उपलब्धि पति को मिलती तो पत्नी चुपचाप उसके पीछे हो लेती और समाज अपनी मौन सहमति भी दे देता, लेकिन इसके उलट स्थिति होने पर आखिर दिक्कत क्यों? 
         सचमुच स्त्री के लिए दोहरे मानदंड आखिर क्यों ?  यही नहीं उसका मानना है कि एक ही शहर में , एक ही पुरुष के साथ पूरी जिंदगी न जाने कैसे लोग बिता देते हैं ?  चूंकि वह खुले दिमाग और खुले विचारों वाली महिला है, उसे किसी की न चिंता है और न ही परवाह। लेकिन अपनी बेटी अनु (सान्या मल्होत्रा) से वह हार जाती है। मसलन एक औरत की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी संतान है। कहा जा सकता है कि एक औरत पर मां भारी पड़ जाती है। जो शकुंतला देवी अपने करियर की सबसे ज्यादा परवाह करती थी, लेकिन उसकी जिंदगी में उससे भी बड़ा स्थान उसकी बेटी का है, जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती है। लेकिन उसकी बेटी उससे नफरत करने लगती है। जल्दी ही अनु को अपनी गलती का अहसास हो जाता है। वह कहती है कि- मां मैंने आपको हमेशा मां के रूप में देखना चाहा एक औरत के रूप में नहीं ।
        यह फिल्म कोरोना संकट के चलते ओटीटी प्लैटफॉर्म अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई है, जो बहुमुखी प्रतिभा की धनी और असाधारण गणितज्ञ शकुंतला देवी का महज जिंदगीनामा ही नहीं है, बल्कि स्त्री सशक्तिकरण का बेहतरीन उदाहरण भी है। निर्देशक अनु मेनन की बेहतरीन पटकथा और निर्देशन तथा विद्या बालन के शानदार अभिनय के लिए यह फिल्म यादगार फिल्मों की श्रेणी में पहली पंक्ति में अपना स्थान बनाने में सफल रही है।

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