BALA Film Review- खुद से प्यार करना सीखो


फिल्म : बाला
निर्देशक : अमर कोशिक
अभिनय : आयुष्मान खुराना, भूमि पेडनेकर, यामी गौतम, सौरभ शुक्ला, उषा पाहवा, जावेद जाफरी
संगीत : सचिनजिगर
गीत : बादशाह, प्रिया सरैय्या,जिगर सरैय्या, भार्गव पुराहित
अवधि : 131 मिनट
रेटिंग : 3.5 स्टार                                                                  


            प्रत्येक व्यक्ति की यह इच्छा होती है कि वह सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व का धनी हो। चूंकि सुदरता का पैमाना गोरा रंग मान लिया गया है इसीलिए बाजार में गोरा करने के लिए केवत तमाम वस्तुएं उपलब्ध हैं बल्कि जो वैवाहिक विज्ञापन प्रकाशित होते हैं, उसमें भी एक अनिवार्य शर्त लिखी होती है कि लड़की गोरी होनी चाहिए। ऐसे में यदि कोई लड़की गोरी नहीं है तो स्वाभाविक रूप से उसकी शादी होने में दिक्कत आती है और इसी वजह से उसमें हीन भावना आने लगती है। बहुत कम ऐसी लड़कियां होती हैं कि वे अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लेती हैं। पहले सुंदरता की यह कसौटी लड़कियों के लिए ही होती थी लेकिन अब इसकी जद में लड़के भी शामिल हो गए हैं। यह फिल्म केन्द्रित है लड़के के गंजे होने के कारण परेशानियां झेलने की। बालमुकुंद उर्फ बाला (आयुष्मान खुराना) बाहरी रूपरंग को बहुत ज्यादा महत्व देता है। वह अपने स्कूल के दिनों में अपनी क्लास में पढ़ने वाली सबसे सुंदर लड़की से दोस्ती करता है और काली लड़की लतिका (भूमि पेडनेकर) को उसके रंग के कारण केवल चिढ़ाता है बल्कि उससे दूर भी रहता है। बाला को अपने जिन कालेघने बालों पर जितना नाज था,बड़े होने पर उसके बाल तेजी से झड़ने लगते हैं और वह गंजा होने लगता है जिसे वह सह नहीं पाता और तमाम उपचार करने लगता है। यहां तक कि वह खुद को आइने में देखने में भी झिझकता है इसीलिए वह आधे आइने को अखबार से ढक देता है। चूंकि वह एक सौदर्य उत्पादन बेचने वाली कंपनी में नौकरी करता है इसलिए भी उसे ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बाला अपनी कंपनी की एक टिक टॉक मॉडल परी (यामी गौतम) से, जो बेहद खूबसूरत है, प्यार ही नहीं करता, बल्कि शादी भी कर लेता है। अपना गंजापन छिपाने के लिए वह बिग का इस्तेमाल करता है। लेकिन शादी के अगले दिन ही उसकी असलियत परी को पता लग जाती है और वह उसे छोड़कर चली जाती है। बाला अपना केस लड़ने के लिए उसी लतिका के पास जाता है, जिसे काली होने के कारण वह पसंद नहीं करता था। लतिका उसे अहसास दिलाती है कि आप जैसे भी दिखते हो यानीगोरेकाले, मोटेपतले, लंबेनाटे, गंजे, उसमें आपका कोई वश नहीं। लेकिन सबसे पहले आप खुद से प्यार करना सीखो तभी सामने वाला आपको स्वीकार करेगा। जब तक आप खुद को स्वीकार नहीं करोगे तो दूसरे से उम्मीद कैसे कर सकते  हो।

       बिल्कुल इसी थीम पर पिछले ही हफ्ते उजड़ा चमन फिल्म आई थी लेकिन  इसने निर्देशक की कल्पना और कलाकारों के अभिनय से जो उंचाई प्राप्त की है, वैसा उजड़ा चमन नहीं कर सकी। आयुष्मान खुराना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह किसी भी जोनर में सीमित नहीं होते और हर बार उनका एक नया लुक दर्शकों को दिखाई देता है इसीलिए एक ताजगी और नया रूप देखने को मिलता है जिसे वह बड़ी ईमानदारी और मेहनत से निभाते हैं। इस फिल्म में भूमि पेडनेकर के मेकअप को लेकर आपत्ति हो सकती है क्योंकि इतना ज्यादा डार्क दिखाने की जरुरत नहीं थी लेकिन उनके अभिनय को लेकर कोई आपत्ति नहीं। चूंकि उन्होंने बेहतरीन काम किया है बल्कि कहें तो वह आयुष्मान खुराना से भी एक कदम आगे निकलती दिखती हैं। यामी गौतम ,खूबसूरत तो हैं ही, उन्होंने अपनी भूमिका भी शानदार निभाई है। सौरभ शुक्ला और उषा पाहवा का काम भी सराहनीय है लेकिन जावेद जाफरी काफी अटपटे लगे हैं।
           इस फिल्म के काफी मजेदार और गुदगुदाने वाले संवाद हैं जो आज के समय,समाज और राजनीति से जोड़ दिए गए हैं। यह फिल्म एक अच्छे मकसद को तो सामने लाती ही है लेकिन भरपूर मनोरंजन भी  करती है,जिसे आप अपने पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं।


© Dr. Sadhna Agrawal

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