इधर लाॅकडाउन के चलते एक अच्छी बात यह हुई है कि भरपूर समय मिल रहा है। जहां कुछ थोड़ा पढ़ने के साथ-साथ कुछ बेहतरीन शोज देखे, जिनमें एक है- पंचायत।
जब फिल्मों से गांव गायब हो रहे हैं उस समय गांव के यथार्थ को दर्शाता एमेजॉन प्राइम पर आ रहा 8 एपीसोड का यह शोज हमें गांव की ओर ले चलता है। इसमें गांव की राजनीति, छल कपट, अच्छाई-बुराई, अंधविश्वास, मनुष्यता, कठिनाई, अभाव सभी को हमारे सामने लाता है।जितेन्द्र कुमार , जिन्होंने डिजिटल दुनिया में जीतू या जीतू भैया के नाम से सुपरिचित हैं, अभिषेक त्रिपाठी के रूप में मुख्य भूमिका में हैं। जो नौकरी के सिलसिले में शहर से गांव पहुंच जाता है। जहां उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
रघुवीर यादव जो ग्रामप्रधान के पति बने हैं और नीना गुप्ता महिला प्रधान बनी हैं का काम सराहनीय है। विकास की भूमिका में चंदन राॅय और उप प्रधान के रूप में फैजल मलिक ने भी शानदार काम किया है। इसको देखकर हमें कभी प्रेमचंद याद आते हैं तो कभी फणीश्वरनाथ रेणु और कभी श्रीलाल शुक्ल। बीच बीच में गालियां सुनाई पड़ती हैं जो संभवत: देश-काल में फिट बैठती हैं। इसके लेखक और निर्देशक को हार्दिक बधाई कि कहीं भी बोरियत नहीं होती बल्कि भरपूर मनोरंजन होता है। हालांकि विश्वनीयता बनाए रखने की भरपूर कोशिश की गई है लेकिन एक गांव प्रधान की जरूरत से ज्यादा इंसानियत पर खटका जरूर होता है।
#Panchayatprime #panchayatreview #jeetuasabhishek #neenagupta #raghubiryadav
जब फिल्मों से गांव गायब हो रहे हैं उस समय गांव के यथार्थ को दर्शाता एमेजॉन प्राइम पर आ रहा 8 एपीसोड का यह शोज हमें गांव की ओर ले चलता है। इसमें गांव की राजनीति, छल कपट, अच्छाई-बुराई, अंधविश्वास, मनुष्यता, कठिनाई, अभाव सभी को हमारे सामने लाता है।जितेन्द्र कुमार , जिन्होंने डिजिटल दुनिया में जीतू या जीतू भैया के नाम से सुपरिचित हैं, अभिषेक त्रिपाठी के रूप में मुख्य भूमिका में हैं। जो नौकरी के सिलसिले में शहर से गांव पहुंच जाता है। जहां उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
रघुवीर यादव जो ग्रामप्रधान के पति बने हैं और नीना गुप्ता महिला प्रधान बनी हैं का काम सराहनीय है। विकास की भूमिका में चंदन राॅय और उप प्रधान के रूप में फैजल मलिक ने भी शानदार काम किया है। इसको देखकर हमें कभी प्रेमचंद याद आते हैं तो कभी फणीश्वरनाथ रेणु और कभी श्रीलाल शुक्ल। बीच बीच में गालियां सुनाई पड़ती हैं जो संभवत: देश-काल में फिट बैठती हैं। इसके लेखक और निर्देशक को हार्दिक बधाई कि कहीं भी बोरियत नहीं होती बल्कि भरपूर मनोरंजन होता है। हालांकि विश्वनीयता बनाए रखने की भरपूर कोशिश की गई है लेकिन एक गांव प्रधान की जरूरत से ज्यादा इंसानियत पर खटका जरूर होता है।
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अच्छी रिव्यू लिखी है साधना जी।
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