Review: Judgemental Hai Kya


मानसिक ट्रॉमा से जूझती बॉबी

फिल्म : जजमेंटल है क्या
निर्देशक : प्रकाश कोवलामुडी
लेखिका : कनिका ढिल्लन
अभिनय : कंगना रनौत, राजकुमार राव, हुसैन दलाल, अमायरा दस्तूर, जिमी शेरगिल
अवधि : 121 मिनट
रेटिंग⭐⭐⭐                                
             
अगर बात फिल्म के शीर्षक की करें तो पहले इसका नाम मेंटल है क्या रखा गया था लेकिन कुछ कारणों से इसको बदलकर जजमेंटल है क्या कर दिया गया, जिससे फिल्म पर संभवत: कोई फर्क नहीं पड़ा। कनिका ढिल्लन ने लिखी कहानी और प्रकाश कोवलामुडी के निर्देशन में बनी यह फिल्म हमें मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को समझने में काफी हद तक मदद करती है और साथ ही यह लोगों में जागरुकता जगाने का भी काम करती है कि ऐसे लोगों की स्थिति को समझने की कितनी आवश्यकता है। अगर किसी के बचपन में कोई अप्रिय घटना घटित हो जाए तो उसका कितना बुरा असर किसी व्यक्ति पर पड़ता है कि वह अपना मानसिक संतुलन भी खो सकता है।

        यह कहानी है बॉबी यानी कंगना रनौत की, जो बचपन में अपने मातापिता को लड़तेझगड़ते, मारपीट करते देखती है और एक दिन एक हादसे में दोनों की मौत हो जाती है। बॉबी पर इस घटना का इतना जबरदस्त असर होता है कि वह सहमी, डरी, घबराई सी रहने के कारण मानसिक रूप से भी बीमार हो जाती है। उसे सच और कल्पना में कोई अंतर नहीं दिखता। जो वह सोचती है, उसी को वास्तविक मान लेती है। वह फिल्मों में डबिंग आर्टिस्ट का काम करती है। इस काम को करतेकरते खुद को वही किरदार समझने लगती है। उसके घर में किरायेदार के रूप में केशव राजकुमार राव अपनी पत्नी रीमा अमायरा दस्तूर के साथ रहने आता है। बॉबी खुद को कभी रीमा की जगह देखने लगती है और मन ही मन केशव की ओर आकर्षित होने लगती है। तभी एक दिन रीमा की हत्या हो जाती है और बॉबी तथा केशव एकदूसरे को आरोपी सिद्ध करने में लग जाते हैं। कुछ समय बाद बॉबी लंदन में अपनी चचेरी बहन के यहां एक नाटक में सीता की भूमिका करने के लिए जाती है लेकिन संयोग से उसकी बहन का पति जब केशव श्रवण के नाम से उसे मिलता है तो बॉबी को लगता है कि अब केशव उसकी बहन को भी मार डालेगा।

          यह फिल्म कंगना रनौत और राजकुमार राव की है जिसे दोनों ने बहुत अच्छे से संभाला है। बॉबी के किरदार को कंगना रनौत ने निभाया नहीं जिया है और एक भी पल ऐसा नहीं लगता कि वह अभिनय कर रही हैं। उनके हावभाव, बोलचाल, रहने का ढंग, खानेपीने से लेकर चेहरे की भंगिमा से लगता है कि उनसे बेहतर इस किरदार को और कोई नहीं कर सकता था। निर्देशक और लेखिका ने बहुत रिसर्च करके ऐसे किरदार को गढ़ा है। क्योंकि उसके आसपास आवाजें आना, लोगों का होना, कल्पना को सच समझना, सड़क किनारे खड़े लोगों के हाथ में तख्तियों पर लिखे वाक्यों को सच मान लेना आदि चीजें एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के द्वंद्व को समझने में मदद करती हैं। घटनाएं इस तरह घटित होती हैं कि भ्रम होने लगता है कि क्या सच है। और दर्शक एक तनाव महसूस करने लगता है। वहीं राजकुमार राव भी कंगना से कहीं भी कमतर नहीं हैं। उनका काम शानदार है और कहा जा सकता है कि लगातार वह सफलता की ओर आगे बढ़ रहे हैं। कंगना रनौत के बॉयफ्रैंड बने हुसैन दलाल के माध्यम से फिल्म में ह्यूमर का तड़का लगाया गया है। जिमी शेरगिल के हिस्से जितना भी काम आया है, अच्छा है।

            इस फिल्म को देखकर पता चलता है कि इस तरह की बीमारी से जूझते लोगों की दुनिया कैसी होती है और उनको कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है। यदि आप लीक से हटकर फिल्म देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपको अच्छी लगेगी।   



©Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof (DU)

  

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