Junglee Movie Review: Rating 2.5/5


जंगल और मनुष्य का रिश्ता


फिल्म : जंगली
निर्देशक : चक रसैल
अभिनय : विद्युत जामवाल, अक्षय ओवरॉय, अतुल कुलकर्णी, मकरंद देशपांडे, आशा भट्ट, पूजा सावंत
संगीत : समीर उदीन
गीत : कुमार सूर्यवंशी, अन्विता दत्त
अवधि : 115 मिनट
रेटिंग⭐⭐स्टार

         यह फिल्म जंगल में रहने वालों और मनुष्यों के संबंधों को सामने लाती है खासकर एक हाथी और एक इंसान की दोस्ती को। लेकिन यह दोस्ती उस तरह की नहीं जैसे 1971 में आई फिल्म हाथी मेरे साथी में थी। यहां एक तरफ ऐसे लोग हैं जिन्हें जानवरों को मारने में कोई संकोच नहीं। लेकिन यहां शौकिया शिकार नहीं किया जाता बल्कि शिकार का मकसद तस्करी करके पैसा कमाना है। दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो अपनी पूरी जिन्दगी इन जानवरों की सुरक्षा में लगा देते हैं। हॉलीबुड निर्देशक चक रसैल की इस फिल्म में जानवरों की तस्करी खासकर हाथी दॉत की तस्करी को दिखाया गया है लेकिन यह फिल्म कुछ ज्यादा फिल्मी होने के कारण अपने मकसद में पूरी तरह खरी नहीं उतरती।
            मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है कि अपने फायदे के लिए वह किसी की जान लेने में भी नहीं हिचकता। तो फिर इसका उपाय क्या हो ? इसका जवाब भी इस फिल्म में मिल जाता है कि यदि हम ठान लें कि हम हाथी दॉंत से बने सामान को नहीं खरीदेंगे तो कुछ हद तक इसे रोका जा सकता है।
           आड़िशा के चंद्रिका नामक जंगल में नायर को केवल हाथियों से प्यार है बल्कि तमाम सुखखुविधाओं को छोड़कर यहीं सेंचुरी में रहता है लेकिन उसका बेटा राज (विद्युत जामवाल) मुंबई में पशु चिकित्सक है जो काफी सालों के बाद जंगल में आता है। उसके बचपन का दोस्त भोला नाम का वह हाथी है जिसके लंबे दॉंतो पर तस्करों की नजर गढ़ी हुई है। दुर्भाग्यवश उन शिकारियों का साथ देता है देव (अक्षय ओवरॉय) जो कहने को तो जंगल का रखवाला है लेकिन अपने स्वार्थों के चलते वह उनकी मदद करता है।


         
राज की भूमिका में विद्युत जामवाल अपने एक्शन के पूरे फॉर्म में नजर आते हैं लेकिन जबरदस्त एक्शन के बावजूद दर्शक उनसे जुड़ नहीं पाता क्योंकि एक निहत्था इंसान एक साथ आधुनिक हथियारों से लैस इतने सारे लोगों का मुकाबला आखिर कैसे कर सकता है ? दूसरे जब वह अपने पिता से नाराज है तो बिल्कुल सहज कैसे दिख सकता है? लेकिन वह फिल्म का हीरो है इसलिए कुछ भी कर सकता है और उसके लिए कुछ भी असंभसव नहीं। लेकिन अब दर्शक  इस तरह के हीरो को ज्यादा पसंद नहीं करते। राज के मुकाबले देव अक्षय ओवरॉय की भूमिका भले ही छोटी है लेकिन ज्यादा विश्वसनीय लगे हैं। गुरु जी की भूमिका में मकरंद देशपांडे का काम सराहनीय लगता है। पत्रकार बनी आशा भट्ट किसी भी परिस्थिति में अपना कैमरा पकड़े रहती हैं जो अटपटा लगता है। महावती के रोल में पूजा सांवत अच्छी लगी हैं।
            इसका एक गीत फकीरा घर जा ठीक लगता है। यह एक एक्शन थ्रिलर फिल्म है लेकिन वास्तविकता की कमी के चलते इसमें वह रोमांच पैदा नहीं होता जो होना चाहिए।   

© Dr Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof. (DU)

Comments

  1. Ma'am your opinion on films are superb. Aapki review k baad main decide karti Hoon

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