Film Review- आन, बान और शान का प्रतीक केसरी


                          


फिल्म : केसरी
निर्देशक : अनुराग सिंह
अभिनय : अक्षय कुमार, परिणीति चोपड़ा, राकेश चतुर्वेदी
संगीत : तनिष्क बागची, आर्को, चिरंतन भट्ट, जसलीन रॉयल
गीत : कुमार, मनोज मुंतशिर, कुंवर जुनेजा, तनिष्क बागची
अवधि : 150 मिनट
रेटिंग : ⭐⭐⭐ स्टार
       इस फिल्म को इतिहास के भूलेबिसरे इतिहास के पन्नों से निकालकर पर्दे पर साकार किया है निर्देशक  अनुराग सिंह ने। 12 सितम्बर 1897 का दिन इतिहास में केवल दर्ज है बल्कि हमारी सेना के शौर्य की याद भी दिलाता है जिन्होंने पूरी दुनिया के सामने अपनी वीरता का परचम लहराया था। बाद में ब्रिटिश संसद में इन वीर सैनिकों को सम्मानपूर्वक याद किया गया था। यह वह समय था जब हिंदुस्तान ब्रिटिश उपनिवेश के अधीन था। एक ओर अफगानी लोग अपना आधिपत्य बढ़ाना चाहते थे तो दूसरी ओर सरकार अपने अधीनस्थ किलों और रियासतों को खोना नहीं चाहती थी। उनकी रजीमेंट में 36 सिक्खों की एक टुकड़ी थी। जिसमें सारागढ़ी के किले पर 10 हजार अफगान कबायलियों ने धाबा बोल दिया तो ब्रिटिश सरकार के 21 सिक्ख सैनिकों के मुखिया हवलदार ईशर सिंह ने निर्णय किया कि हम उन  10 हजार अफगान सैनिकों का मुकावला करेंगे। क्योंकि अगर हम आजादी की जिन्दगी जी नहीं सकते तो क्या मर तो सकते हैं।
             यह फिल्म इस बात को दिखाती ही नहीं बल्कि शिद्दत से हमें इस बात का अहसास कराती है कि भले ही हमारे पास दुश्मनों के मुकाबले सैनिक संख्या उंगुलियों पर गिनने लायक थी लेकिन हमारे साहस, शौर्य, पराक्रम, उत्साह, वीरता और ताकत में कोई कमी नहीं थी। यह अपनी मिट्टी से प्रेम का जज्बा ही तो था कि मात्र 21 सिपाहियों ने 10 हजार अफगान सैनिकों का मुकावला करने का फैसला किया। शायद आज इसे पागलपन करार दिया जाए। दरअसल केसरिया रंग जो प्रेम और शौर्य का प्रतीक माना जाता है, उस रंग में रंगने का बेचैन थे वे 21 सिक्ख सैनिक।

       सरदार ईशर सिंह को देखकर लगता है कि अक्षय कुमार ने ईशर सिंह को पूरी तरह आत्मसात कर  लिया हो क्योंकि जब अंग्रेज अफसर उन्हें गुलामी की याद दिलाता है और वतन की मिट्टी को ललकारता है तो उसे अपनी केसरिया पगड़ी की आन, बान और शान के आगे कुछ भी दिखाई नहीं देता। वह अपने साथियों को इस लड़ाई का अंजाम बताकर निश्चय करके युद्ध की विभिषिका में कूद पड़ता है। ईशर सिंह की पत्नी बनी परिणीति चोपड़ा जबजब पर्दे पर आती हैं, अपनी सशक्त उपस्थिति से दर्शकों को बांध लेने में कामयाब होती हैं। अफगानी सेना में मुल्ला बने राकेश चतुर्वेदी का काम सराहनीय है। एक जगह जब ईशर सिंह मुल्ला को 'चल झूठा' कहते हैं तो उनका पूरा चरित्र उजागर हो जाता है।

         हालांकि इस तरह की फिल्मों में गीतसंगीत की ज्यादा गुजांइश नहीं होती फिर भी इसका एक गाना 'तेरी मिट्टी' बहुत अच्छा लगता है। जब यह पर्दे पर आता है तो बदन में सिहरन होने लगती है और अपने वतन से  और ज्यादा प्यार।

          लेकिन इसकी एक बड़ी कमी इसकी लंबाई है जो खलने लगती है और एक हद तक बोरियत भी होने लगती है। वैसे कुल मिलाकर कहा जाये तो अनुराग सिंह इतिहास के पन्नों से एक ऐसा भूला हुआ अध्याय हमारे सामने लाये हैं जिसे देखकर हमें अपने उन सिक्ख सैनिकों पर नाज़ होता है जिन्हें अपने प्राणों की बाजी लगाने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं हुई।

©-Dr. Sadhna Agrawal 
Film Critic & Faculty (Delhi University)

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