खतरों के बीच मासूम पीहू
फिल्म: पीहू
निर्देशक: विनोद कापड़ी
अभिनय: मायरा विश्वकर्मा, प्रेरणा विश्वकर्मा
‘मिस
टनकपुर हाजिर हो’ के
बाद निर्देशक विनोद कापड़ी की यह दूसरी
ही फिल्म है और इस
फिल्म को देखने के
बाद विनोद कापड़ी को सैल्यूट करने
का मन करता है।
जो लोग सिनेमा बनाने में माहिर हों या नये उनको
पीहू जरुर देखनी चाहिए। इसलिए भी कि कोई
कामयाब और सफल फिल्म
बनाने के लिए जरुरी
नहीं कि बड़े—बड़े
नामी कलाकारों को लिया जाए
या फिर भव्य और दिव्य सेट
निमार्ण के लिए लाखों
रूपये खर्च किये जाएं। इस फिल्म की
इतनी खूबियां हैं कि आप गिनाते
रहिए और फिर भी
आपकी बात खत्म न हो। न
कोई बड़ी स्टार कास्ट, न भव्य लोकेशन,
न ग्लैमर का तड़का, न
गीत—संगीत, न ही कोई
आइटम नंबर, न मार—धाड़,
न ही कोई डायलाग
का कमाल। फिर भी इतनी कामयाब
कि कई दिनों तक
यह आपका पीछा नहीं छोड़ती। यहां तक कि सपने
में भी आप पीहू
को ही देखते हैं,
तो ऐसा क्या है पीहू में
?
पूरी
फिल्म मात्र 2 साल की मासूम और
अबोध बच्ची पीहू की है। पीहू
के माता—पिता में अनबन हो जाती है।
पिता पीहू की बर्थडे पाट्री
में शामिल नहीं हो पाता। पिता
अपनी मीटिंग के लिए कलकत्ता
चला जाता है और मां
नींद की गोलियां खाकर
आत्महत्या कर लेती है।
पीहू तमाम कोशिश करती है अपनी मां
को उठाने की और बार—बार मासूमियत से भर उसे
हिलाकर कहती है— मम्मा उठो, उठो न मम्मा। वह
मासूम नहीं जानती कि अब उसकी
मां कभी नहीं उठेगी। घर में चारों
तरफ खतरा है। हर कदम पर
खतरा मंडरा रहा है और उस
खतरे के बीच पीहू
अकेली है। कोई उसकी हिफाजत करने वाला नहीं। कोई उसे संभालने वाला नहीं। कोई उसे चुप कराने वाला नहीं। कोई उसे गोद में उठाकर दुलारने वाला नहीं। कोई उसे रोकने वाला नहीं। पीहू कभी खुद भूख लगने पर रोटी को
माइक्रोबेब मे गर्म करने
की कोशिश करती है तो कभी
गैस पर। गैस खुली है, रोटी जल गई है,
उसके पापा प्रेस का स्विच बंद
करना भूल गए है, पीहू
अपना पाजामा उस पर फेंकती
है, जलती प्रेस से धुआं निकलता
है। किचेन में पानी बह रहा है
जो धीरे—धीरे पूरे घर में भर
जाता है। पीहू उस पानी में
भी छपाक—छपाक कर खेलती है।
कभी पीहू अपनी दूध की बोतल में
दूध समझकर फिनाइल भर लेती है,
कभी गीजर जल कर ब्लास्ट
हो जाता है। कभी टीवी चलाकर अपना मनोरंजन भी करती है, कभी
अपना हाथ जला बैठती है।कभी पीहू बालकनी में झांकती है और उसकी
गुड़िया नीचे गिर जाती है तो खुद
ब खुद दर्शकों की हार्ट बीट
बढ़ जाती है और मुंह
से निकल जाता है पीछे हटो
बच्चा। कभी मां की नेल पालिश
लगाती है तो कभी लिपिस्टक।
कभी नींद की गोलियों को
देखकर कहती है, मैं भी खा लूं।
खाकर कहती है—खट्टी है।
अंतत: वह अपने खिलौनों
से खेलते—खलते एक नया और
खूबसूरत घर बनाती है।
इस
फिल्म को देखते हर
पल तनाव बना रहता है क्योंकि तमाम
खतरों के बीच अकेली
2 साल की मासूम पीहू
है और दर्शक लाचार
होकर देखता रहता है कि अब
कौन सी नई मुसीबत
और खतरे का सामना पीहू
को करना होगा। हर क्षण मन
में बेचैनी बनी रहती है कि उस
बच्ची को गोद में
उठा लें और उसकी जान
बचा ली जाए। क्योंकि
पीहू उन खतरों से
बेखबर है।
इस
फिल्म में केवल दो किरदार दिखाई
दिए हैं एक—पीहू और
दूसरी उसकी मां। लेकिन मां मरी हुई है इसलिए वह
कुछ कर नहीं सकती
तो पूरी फिल्म अकेली पीहू की हो जाती
है। मेरी जानकारी में हिंदी सिनेमा में यह ऐसी पहली
फिल्म है जो एक
छोटी सी 2 साल की बच्ची पर
केन्द्रित है। अकेले किरदार पर केन्द्रित हो
सकती है लेकिन इस
उम्र के किरदार पर
केन्द्रित नहीं। इसलिए विनोद कापड़ी को श्रेय जाता
है कि उन्होंने असंभव
को संभव कर दिखाया है।
साथ ही यहां कई
सवाल भी उठते दिखते
हैं कि आज छोटी—छोटी बातों पर भी पति—पत्नी में न केवल अनबन
हो जाना बल्कि तलाक होना, आत्महत्या करना मानो फैशन हो गया है।
यह भी नहीं सोचना
कि उनके पीछे छूटे बच्चों का क्या होगा?
या उनकी गलतियों की सजा बच्चों
को भुगतनी होगी। दूसरा सवाल यहां यह है कि
हमारी संवेदनाएं इस कदर खत्म
होती जा रही हैं
कि हमें मालूम ही नहीं होता
कि हमारे पड़ोस में क्या अनहोनी हो गई है।
या फिर हम अपनी व्यस्तताओं
के चलते इतने एकाकी हो गए हैं
कि हमें दूसरों से कोई मतलब
ही नहीं।
आज अधिकांश लोगों
को पता नहीं होता कि उनका लक्ष्य
क्या है ? या उन्हें कौन
सा रास्ता चुनना चाहिए ऐसे में पत्रकार से सिनेमा की
दुनिया में गए विनोद कापड़ी
से मुझे बस यही कहना
है कि आपका असली
रास्ता यही है और आज
हिंदी सिनेमा को ऐसे एक
नहीं कई विनोद कापड़ी
की जरुरत है।
-Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof (Delhi University)

खूबसूरत फ़िल्म की अत्यंत संवेदनशील समीक्षा।
ReplyDeleteआभार गरिमा जी
DeleteChild Pihu has done a great job
ReplyDeleteबहुत सहजता से साधना जी आपने पीहू के विषय मे लिखा है । तबियत खुश हो गयी। अब तो जान ही होगा।
ReplyDeleteआभार अनुज जी।
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