अस्सी की
खिड़की
से
दिखाई
देती
दुनिया
फिल्म: मोहल्ला अस्सी
निर्देशक: चंद्रप्रकाश द्विवेदी
अभिनय: सनी देओल, साक्षी तंवर, रवि किशन, सौरभ शुक्ला, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी
संगीत: अमोद भट्ट
गीत: गुलजार
अवधि : 120 मिनट
रेटिंग : 2 . 5 स्टार
सुप्रसिद्ध
कथाकार काशीनाथ सिंह के बहुचर्चित उपन्यास
पर आधारित इस फिल्म को
पर्दे पर उतारा है
निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने। जो इससे पहले
अमृता प्रीतम की रचना पर
आधारित फिल्म पिंजर भी बना चुके
हैं। हालांकि यह फिल्म पिछले
कई सालों से किन्हीं कारणों
से अधर में लटकी थी। यह फिल्म बनारस
के एक मोहल्ले पर
केन्द्रित है।
काशी
भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म
की साधना पीठ ही नहीं रही
है बल्कि मोक्ष स्थली भी। यही कारण है कि काशी
में देशी—विदेशी इतिहासकारों,साहित्यकारों एवं पर्यटकों की दिलचस्पी रही
है। लेकिन इस फिल्म में
सम्पूर्ण काशी को नहीं सिर्फ
उसके एक मोहल्ले 'अस्सी'
को केन्द्र में रखकर देश के ही नहीं
विदेश के भी महत्वपूर्ण
मुद्दों पर बेलाग टिप्पणी
की गई है। जो
उस लोक परंपरा की याद दिलाती
है जिसके वारिस कबीर और भारतेन्दु थे।
इसके
आरंभ में लेखक की एक छोटी
सी टिप्पणी है —'शहर बनारस के दक्खिनी छोर
पर गंगा किनारे बसा ऐतिहासिक मोहल्ला अस्सी। अस्सी चौराहे पर भीड़—भाड़
वाली चाय की एक दुकान।
इस दुकान में रात—दिन बहसों में उलझते, लड़ते—झगड़ते, गाली—गलौज करते कुछ स्वनामधन्य अखाड़िए बैठकबाज। न कभी उनकी
बहसें खत्म होती हैं, न सुबह—शाम।
जिन्हें आना हो आएं, जाना
हो जाएं। इसी मोहल्ले और दुकान का
लाइव शो है यह
कृति। उपन्यास का उपन्यास और
कथाएं की कथाएं। खासा
चर्चित, विवादित और बदनाम। लेकिन
बदनाम सिर्फ अभिजनों में, आमजनों में नहीं। आमजन और आमपाठक ही
इस उपन्यास के जन्म की
जमीन रहे हैं।'
यद्यपि
इस उपन्यास में पांच कथाएं थीं लेकिन फिल्म में सिर्फ एक 'पांडे कौन कुमति तोहे लागी' पर आधारित निर्देशक
ने इसको पर्दे पर उतारा है।
दरअसल अस्सी वह खिड़की है
जहां से न केवल
दुनिया को दिखाया गया
है बल्कि देश—विदेश की महत्वपूर्ण घटनाओं
पर टिप्पणी करते भी दिखाया गया
है। फिल्म में बार—बार पप्पू की चाय की
दुकान दिखाई देती है, जहां तमाम बहसें होती हैं।
दरअसल
अस्सी में रहने वाले अधिकांश लोग आदर्शवादी, नैतिकतावादी, शुचितावादी, भारतीय संस्कृति, भाषा और धार्मिक विचारों
को अपनाने वाले लोग है खासकर पांडे
जी (सनी देओल) और उनकी पत्नी
साक्षी तंवर। लेकिन वे भी समय
की मार और बढ़ती भौतिकतावादी सुख—सुविधाओं की गिरफ्त में
आने से बच नहीं
पाते लेकिन बाद में उन्हें अपनी गलती का अहसास हो
जाता है।
लेकिन
किसी कृति को पर्दे पर
उतारने के लिए थोड़ा
फेर—बदल करने की आवश्यकता होती
ही है और होनी
भी चाहिए। इस क्रम में
यदि अत्यधिक गालियों के प्रयोग से
बचा जा सकता तो अच्छा होता।
हालांकि गालियों के प्रयोग को
लेकर इसके लेखक पर पहले भी
आक्षेप लगाए गए थे और
तब लोगों ने तर्क दिया
था कि बिना गालियों
के प्रयोग के अस्सी का
असली रंग—ढंग ठीक से नहीं उभरता,
फीका ही रहता। लेकिन
फिर भी मेरा मानना
है कि भाषा के
भदेसपन और व्यंग्यात्मकता की
धार ने इसको सार्थकता
प्रदान की है।
सनी
देओल पांडे जी की भूमिका
में असर छोड़ते हैं वहीं साक्षी तंवर का अभिनय शानदार
है। रवि किशन, सौरभ शुक्ला, राजेन्द्र गुप्ता, सीमा आजमी, मुकेश तिवारी आदि का काम सराहनीय
है। बाबू गया सिंह की भूमिका में
मिथिलेश चतुर्वेदी ने बेहतरीन काम
किया है। कुल मिलाकर कह सकते हैं
कि यह फिल्म अस्सी
के बहाने लोगों की भावनाओं,विचारों,
चिंताओं को सामने लाती
है।
- Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof (Delhi University)

Pihu is a better movie
ReplyDeleteEk dum sahi pratikriya Sadhna ji
ReplyDeleteThank you
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