Bazaar Film Review: 2/5


छल छद्म से भरा बाजार


फिल्म : बाजार
निर्देशक : गौरव के चावला
अभिनय : सैफ अली खान, रोहन मेहरा, राधिका आप्टे, चित्रांगदा  सिंह
संगीत : यो यो हनी सिंह, बिलाल सईद, कनिका कपूर, अमाल मलिक, तनिष्क बागची, सोहेल सेन
अवधि : 140 मिनट
रेटिंग : 2 स्टार


             निखिल आडवाणी द्वारा लिखित और गौरव के चावला द्वारा निर्देशित फिल्म बाजार हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां सब कुछ पैसा है। इसीलिए इसमें धोखा है, फरेब है, झूठ है, ग्लैमर है, सट्टेबाजी है, जालसाजी है, छलछद्म है। दरअसल यह बाजार आम बाजार होकर खास बाजार यानी स्टॉक मार्केट है। आजकल लीक से हटकर फिल्में बनने लगी हैं,जो अच्छी बात है लेकिन इसका एक दुष्परिणाम यह होता है कि इसका दायरा सीमित हो जाता है।

            इस फिल्म में एक तरफ सैफअली खान यानी शकुन कोठारी है जो इस बाजार का बादशाह है। जिसका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है चाहे तरीका कोई भी क्यों हो ? वह मैथ्स पर यकीन करता है। उसकी दुनिया में रिश्तो की कोई अहमियत नहीं और ही भावनाओं की। वह यहां नायक की भूमिका में भी है और खलनायक की भूमिका में भी। दूसरी ओर इलाहाबाद जैसे छोटे शहर का रहने वाला रोहन मेहरा यानी रिज़वान अहमद शकुन कोठारी को अपना आइडियल मानता है और उसका जैसा बनना चाहता है। क्योंकि उसे अपने ईमानदार पिता की वफादारी अच्छी नहीं लगती। उसे तो कम समय में बड़ा आदमी बनना है। रिज़वान अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई जाता है और बहुत जल्दी वह शकुन कोठारी से केवल मिलता है बल्कि उसके लिए काम भी करने लगता है लेकिन वह उसके जाल में फंस जाता है।

          सैफअली खान ने इसमें बेहतरीन अभिनय किया है। वह एक धोखेबाज, फ्रॅाड, चालाक, धूर्त, मक्कार इंसान है, जिसके लिए पैसा ही सब कुछ है। विनोद मेहरा के बेटे रोहन मेहरा ने इस फिल्म से डेब्यू किया है। इसमें वह सैफअली खान केअपोजिट होकर भी कहीं कमतर नहीं लगे हैं। जब अपने सपनों को हकीकत में बदलने वह मुंबई आता है तो वह एक दृश्य में एक थूकी हुई कॉफी को बेचने के लिए खुद पी लेता है और सबको हैरत में डाल लेता है। रोहन मेहरा की प्रेमिका बनी राधिका आप्टे अच्छी लगी है जो खुद एक शेयर कंपनी में काम करती है लेकिन शकुन कोठारी की पत्नी की भूमिका में चित्रांगदा सिंह की भूमिका और हैसियत सिर्फ दिखावे के लिए है।

               इस फिल्म के मिजाज के अनुरूप इसका गीतसंगीत है जो दर्शकों पर कोई असर नहीं छोड़ता।
              यह फिल्म पूरी तरह बिखरी और भटकी हुई ही नजर नहीं आती है बल्कि कंफ्यूजन भी खूब पैदा करती है। एक तरफ रिजवान को अपने पिता की ईमानदारी और वफादारी से चिढ है लेकिन दूसरी ओर शकुन कोठारी के व्यवहार से अचानक उसकी अंतरात्मा जाग उठती है। दूसरे यह बात भी समझ से परे है कि इतना बड़ा व्यापारी और पैसे को ही अपना भगवान मानने वाला शकुन कोठारी एक सड़कछाप ढावे पर रोजाना खाना खाने क्यों आता है ? ऐसी ही और भी कई बेतुकी बाते हैं जिन्हें इस फिल्म में परोसा गया है।

      यदि आप शेयर मार्केट की दुनिया में रुचि रखते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है वरना मुझ जैसे दर्शकों को केवल वोरियत ही होगी और समय काटना मुश्किल।

-Dr Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof, Delhi University 

Comments

  1. छल छद्म से भरा बाजार। बहुत अच्छे विचार बाज़ार फिल्म के प्रति ।

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