Vishwaroopam 2: Film Review

               आतंकवाद से मुठभेड़                                                                                           

फिल्म :    विश्वरूपम 2
निर्देशक कमल हसन
अभिनय:  कमल हसन, राहुल बोस, शेखर कपूर, पूजा कुमार, बहीदा रहमान, जयदीप अहलावत, एंड्रिया
संगीत :    मोहम्मद ग्रिबान
गीत :       प्रसून जोशी
अवधि :   144 मिनट
रेटिंग :     1.5/5                  

                 

                  आज फिल्मकारों के पास एक बड़ा आसान रास्ता है कि अपनी पुरानी फिल्म को थोड़ाबहुत हेरफेर करके नए मिश्रण की चाशनी में लपेटकर उसका सीक्वल बनाकर दर्शकों पर थोप दिया जाए। मुझे यह बात समझ नहीं आती कि उनके पास क्या सचमुच नए विषयों की कमी होती है या फिर मेहनत से बचते हैं। कारण चाहे जो भी हों, पैसा और समय दोनों ही बर्बाद होते हैं। यह फिल्म भी वर्ष 2013 में आई विश्वरूपम का सीक्वल है। ऐसी सीक्वल फिल्मों के साथ एक और दिक्कत यह होती है कि यदि आपको किसी फिल्म का सीक्वल देखना है तो आपको पहला भाग देखना होगा और यदि किसी कारणवश नहीं देखा है तो कयास लगाते रहिए कि इसके पहले भाग में क्या था। और यदि देखी भी है तो अपने दिमाग पर जोर डालिए और उसको याद कीजिए। क्योंकि चाहते हुए भी तुलना करनी पड़ती है कि यह वाली ठीक हैया पहली वाली ज्यादा अच्छी थी। कुछ तो और भी महान होते हैं कि एक भाग तो संभल नहीं रहा कि दूसरा बनाने निकल पड़े। इस फिल्म के साथ भी ऐसा ही हुआ है। फिल्म कई बार फ्लैशबैक में आतीजाती है और आपके दिमाग की कई नसें फड़फड़ाने लगती है। लोग फिल्म इसलिए देखने जाते हैं कि कुछ मनोरंजन होगा और आप तनावमुक्त महसूस करेंगे, यहां बिल्कुल उल्टा होता है। तो मनोरंजन होता है और ही आप प्रसन्न एवं तनावमुक्त होते हैं।
                             यह फिल्म वहीं से शुरू होती है जहां पहला भाग खत्म हुआ था। इसीलिए अगर किसी ने पहला भाग नहीं देखा तो वह केवल सिर धुनता रह जाता है। रॉ ऐजेन्ट मेजर विसाम अहमद कश्मीरी (कमल हसन) का उद्देश्य अलकायदा के ओमार कुरैशी (राहुल बोस) द्वारा फैलाये आतंकवाद को रोकना है। इस मिशन को पूरा करने में एक तरफ उसकी पत्नी निरुपमा (पूजा कुमार) और सहयोगी अस्मिता (ऐंड्रिया ) है तो दूसरी ओर कर्नल जगन्नाथ (शेखर कपूर) हैं। विसाम को पता चलता है कि कुरैशी ने हमारे देश भारत में अलगअलग जगहों पर 64 बम लगा रखे हैं। विसाम के द्वारा केवल संकेत किया गया है कि वह इस साजिश को नाकाम करेगा लेकिन कब, यह नहीं दिखाया। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि निर्देशक के मन में इसके तीसरे पार्ट बनाने की योजना चल रही हो। इसी बीच नाटकीय ढंग से विसाम की मां की एंट्री होती है,जो अलजाइमर की मरीज हैं।

                            पूरी फिल्म में जबरदस्त ऐक्शन है, मारकाट है, खूनखराबा है, खतरनाक स्टंट हैं। कमल हसन, जो चाची 420 में अपने अच्छे अभिनय के लिए जाने जाते हैं, इसमें भी उन्होंने बढ़िया काम किया है लेकिन अब थकावट उनके चेहरे पर दिखाई देती है। पूजा कुमार और ऐंड्रिया खूबसूरत तो लगी ही हैं लेकिन दोनों ने ही ऐक्शन सीन्स को भी बखूवी किया है। राहुल बोस फिल्म के आखिर में अपने दमदार अभिनय से बिल्कुल आतंकवादी लगने लगते हैं। शेखर कपूर, जयदीप अहलावत का काम ठीकठाक है लेकिन बहीदा रेहमान का किरदार ठूंसा हुआ लगता है जो कहीं से मेल नहीं खाता। एक तरफ वह अपने बेटे को तो पहचानती नहीं हैं लेकिन बहू की पसंद करती हैं,जो अटपटा लगता है।
                               इसका गीतसंगीत बिल्कुल साधारण है। हां, बैकग्राउंड स्कोर फिर भी ठीक लगता है। यह फिल्म इतनी उलझा दी है कि आप इसकी कड़ियां ही जोड़ते रह जाएंगे। इतना खनूखराबा देखकरआपका मन विचलित हो सकता है इसलिए अगर आपका दिल कमजोर है तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है, खासकर बच्चों के लिए तो बिल्कुल नहीं।   


Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic & Assistant Professor, Delhi University
Email: agrawalsadhna2000@gmail.com
Facebook https://www.facebook.com/sadhna.agrawal.9

  

            

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