Soorma Review


हिम्मत और हौंसले का सूरमा
                                                                                                 साधना अग्रवाल

फिल्म : सूरमा
निर्देशक : शाद अली
अभिनय : दिलजीत दोसांझ, अंगद बेदी, तापसी पन्नू, विजय राज, कुलभूषण खरबंदा, सतीश कौशिक
संगीत : शंकर अहसान लॉय
गीत : गुलजार
अवधि : 131 मिनट
रेटिंग : 3 स्टार
लगता है पिछले कुछ सालों से बॉयोपिक फिल्मों का क्रेज लगातार बढ़ता जा रहा है जिसका परिणाम अभी पिछले दिनों ही आई संजय दत्त पर आई  बायोपिक फिल्म  संजू और आने वाली फिल्म गोल्ड को देखा जा सकता है। हालांकि बायोपिक फिल्म बनाना कोई हंसीमजाक नहीं लेकिन दर्शकों के इस ओर  बढ़ते रुझान को देखते फिल्मकार इस ओर लगातार आगे बढ़ रहे हैं। निर्देशक शाद अली  अपने अभी तक के सफर में दोतीन ही बेहतरीन फिल्में बना पाए हैं लेकिन उनकी झूम बराबर झूम और किल दिल उनके घटिया निर्देशन का सबूत कही जा सकती हैं। इसलिए संभवत: शाद अली के लिए दर्शकों का भरोसा और दिल जीतना मुश्किल होगा।

          यह फिल्म भारतीय हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह के जीवन पर केन्द्रित है। 1994 के पंजाब के शाहबाद से फिल्म की कहानी शुरू होती है। शाहबाद के हर मातापिता चाहते हैं कि उनका बच्चा भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा बन सके। इसी क्रम में बालक संदीप सिंह के मातापिता भी चाहते हैं कि उनके दोनों बेटे हॉकी खेलें। लेकिन कोच के सख्त अनुशासन और सजा मिलने के कारण संदीप को हॉकी में कोई रुचि नहीं रहती। लेकिन युवा संदीप (दिलजीत दोसांझ) जब हरप्रीत (तापसी पन्नू) को हॉकी खेलता देखता है तो वह उसे अपना दिल दे बैठता है और हॉकी खेलना शुरू कर देता है जिसमें उसकी प्रतिभा की पहचान उसका बड़ा भाई बिक्रम (अंगद बेदी ) करता है और अपने भरसक उसे आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। चूंकि बिक्रम खुद एक हॉकी खिलाड़ी है लेकिन भारतीम टीम में चुना नहीं जाता। अब उसकी पूरी कोशिश अपने छोटे भाई संदीप को देश का  बेहतरीन खिलाड़ी बनाने की है। संदीप हॉकी के मैदान में अपने गोल करने के लिए  फ्लिकर  सिंह के नाम से जाना जाता है। तभी एक ट्रेन हादसे में संदीप को गोली लग जाती है और उसकी कमर के नीचे का हिस्सा पैरालाइज्ड हो जाता है। डा0 का कहना है कि अब वह कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता इस कारण वह कभी हॉकी नहीं खेल पाएगा। संदीप के साथसाथ उसका पूरा परिवार सदमें में है। उधर हरप्रीत संदीप को बेसहारा छोड़ कर दूर चली जाती है। इस बुरे वक्त में परिवार की हिम्मत और हौंसले के बलबूते संदीप केवल ठीक हो जाता है बल्कि वह कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का सिर उंचा करता है और स्वर्ण पदक भी दिलाता है।

               संदीप सिंह की भूमिका को दिलजीत दोसांझ ने बखूबी निभाया है। एक मस्त मौला लड़का जो प्यार पाने के लिए कोई भी कदम उठा सकता है। दिलजीत ने कोई भी पल कमजोर नहीं पड़ने दिया है और खुद को संदीप सिंह के किरदार में ढाल लिया है। संदीप सिंह के बड़े भाई के किरदार में अंगद बेदी ने बेहतरीन काम किया है। वहीं हरप्रीत के रोल में तापसी पन्नू अच्छी लगी हैं। जहां पहले संदीप हरप्रीत को देखकर अपना निशाना चूक जाते थे इसलिए पूरी फिल्म में वह कहते नजर आते हैं कि जब भी मेरा मैच हो तो तू देखने मत आना लेकिन बुरे वक्त में धोखा देने वाली प्रेमिका से वही संदीप कॉमनवेल्थ में मैच देखने के लिए उसे निमंत्रण देते हैं ताकि शायद यह बता सकें कि अब उन्हें हरप्रीत की उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता। बाकी सह कलाकारों को काम भी अच्छा है, खासकर विजय राज का।
कितनी अजीब बात है कि यद्यपि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है लेकिन लोग क्रिकेट के दीवाने हैं, हॉकी के नहीं। इसीलिए सभवत: हम किसी क्रिकेटर की जिन्दगी से जितना ज्यादा परिचित हैं उतना किसी और खिलाड़ी से नहीं। हालांकि इस फिल्म में संदीप कहते हैं कि 'प्लेयर तो प्लेयर है चाहे वह क्रिकेट का हो या फिर हॉकी का।' लेकिन सच्चाई यही है कि जो लोकप्रियता हॉकी को मिलनी चाहिए, वह अभी तक नहीं मिली।
       इसके गीत गुलजार ने लिखे हैं और संगीत से सजाया है शंकर अहसान लॉय ने। इसका बैकग्राउंड स्कोर अच्छा लगता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि यह फिल्म देखकर एक खिलाड़ी के हौंसले और जज्वे को सलाम करते हुए कहना पड़ता है कि सचमुच संदीप सिंह हमारे देश के सूरमा हैं। 
               
           

         

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