वे देवता नहीं है
फिल्म :
सिर्फ एक बंदा काफी है
निर्देशक: अपूर्व सिंह कार्की
लेखक: दीपक किंगरानी
अभिनय :
मनोज वाजपेयी, अद्रिजा सिन्हा, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ, जय हिंद कुमार, विपिन शर्मा
रेटिंग : 4 स्टार
हमारे देश में धर्म की शक्ति इतनी ज्यादा है कि उसकी आड़ में निरीह, मासूम और भोली—भाली जनता को बहुत आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। यही कारण है कि लोग आंख मूंदकर आस्था और धर्म के दिखाये मार्ग पर बिना किसी संकोच के चल पड़ते हैं,जिसका नाजायज फायदा कुछ ढोंगी, मक्कार,झूठे, फरेबी लोग, साधु और संतों का लबादा ओढ़कर इसका फायदा उठाने में कामयाब हो जाते हैं। कुछ सालों पहले तथाकथित संत आशाराम बापू की काली करतूतों का पर्दाफाश हुआ था और वर्ष 2018 में उसे आजीवन कारावास की सजा हुई थी। इस घटना को न केवल पूरे देश ने देखा बल्कि खुद को ठगा भी महसूस किया। 5साल तक चले लंबे संघर्ष को पूरे समाज ने देश के कानून के बड़े—बड़े जानकारों को भी देखा। लेकिन आस्था की बुनियाद इतनी मजबूत होती है कि कुछ भोले—भाले लोग इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाते और अब भी उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं।
यह फिल्म इसी घटना पर केन्द्रित है जिसमें वकील पी सी सोलंकी की भूमिका मनोज वाजपेयी ने निभाई है। उन्हें देखकर कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वह अभिनय कर रहे हैं। इस फिल्म से उन्होंने अपने अभिनय की बुलंदियों को छू लिया है क्योंकि इतना जीवंत अभिनय करने के लिए खुद को उस किरदार में ढाल लेना कोई साधारण बात नहीं। पीड़िता लड़की की भूमिका अद्रिजा ने निभाई है जो सराहनीय और बेहतरीन है। बाबा के रूप में सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ विश्वसनीय लगे हैं। बिना बोले भी केवल चेहरे के भाव से ही सब कुछ कह देते हैं।
इस फिल्म को देखते कुछ बातें साफ नजर आती हैं जैसे— कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो,उसके पाप का घड़ा एक न एक दिन फूटता अवश्य है। दूसरी उस मासूम बच्ची की हिम्मत की दाद देनी होगी कि उसने देवता तुल्य बाबा की सच्चाई दुनिया के सामने लाने की हिम्मत दिखाई क्योंकि अधिकांश लड़किया ऐसे मामलों में या तो चुप रह जाती हैं या उन्हें चुप करा दिया जाता है। तीसरी बात घोर आर्थिक समय में बिना किसी लाभ—लोभ के सोलंकी जैसे साधारण वकील ने इतने शक्तिशाली बाबा के खिलाफ लड़ाई लड़ने का निश्चय किया। हालांकि उन्हें करोड़ो रू0 घूस देने की कोशिश की गई लेकिन वह एक ही झटके में उसे ठुकरा कर उसके खिलाफ केस लड़ने का फैसला ही नहीं करता बल्कि बहुत बड़ा खतरा भी मोल लेता है। चूंकि सोलंकी इस बच्ची का केस इसलिए भी लड़ना चाहता था क्योंकि यह बच्ची अपनी आवाज उठाना चाहती थी,अपने लिए लड़ना चाहती थी, जो छोटी नहीं, बहुत बड़ी बात थी।
यह फिल्म पूरे समय दर्शकों को अपनी गिरफ्त में लेने में कामयाब हुई है। चूंकि इस घटना को पूरा देश जानता है लेकिन पर्दे पर घटित होते देखना किसी रोमांच से कम नहीं है। इसका अंत भी इससे बेहतर नहीं हो सकता। जज साहब के फैसला सुनाने से पहले सोलंकी रामायण का उदाहरण देकर कहता है कि हमारे देश में धर्म से बड़ा कुछ नहीं है और धर्म ही सब कुछ है तो मैं भी एक कहानी सुनाना चाहता हूं। राम —रावण युद्ध में रावण को मरने के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई जबकि वह शिवजी का परमप्रिय भक्त था। रावण मरने के बाद भी सालों तक तपस्या करता रहा कि शिवजी दर्शन देंगे और उसको क्षमा करेंगे। मगर शिवजी ने ऐसा नहीं किया। यह देखकर पार्वती ने शिवजी से पूछा कि आप इतने कठोर कैसे हो सकते हैं तो शिवजी कहते हैं—
इस संसार में कुकर्म को 3 भागों में बांटा गया है—
— पहला पाप, जो आदमी कभी जाने—अनजाने में करता है,उसका निवारण प्रायश्चित करके हो सकता है।
— दूसरा, अति पाप के रूप में जाना जाता है जैसे हत्या,अपहरण, जघन्य अपराध आदि, उसकी भी माफी कुछ हद तक संभव है।
— तीसरा, महापाप के रूप में जाना जाता है जिसकी कोई माफी नहीं है।
पार्वती ने शिवजी को टोकते हुए कहा कि रावण ने तो सीता जी का अपहरण किया था तो उसे अतिपाप के रूप में माना जाना चाहिए,आप उसे महापाप क्यों कह रहे हैं? तो शिवजी मुस्कराए और कहा कि जिस पाप का प्रभाव पूरे संसार की मानवता और प्रभुता पर सदियों तक रहता है, वह महापाप के अंतर्गत आता है। मैं रावण को माफ कर देता अगर उसने रावण बनकर सीता का अपहरण किया होता लेकिन उसने साधु का वेष धारण किया था जिसका प्रभाव पूरे संसार पर सदियों तक रहेगा जिसकी कोई माफी नहीं हो सकती।' और यह बाबा रावण है रावण,इसे कतई नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
इस
फिल्म का शीर्षक बहुत
सटीक है जैसा कि
कहावत है एक मछली पूरे
तालाब को गंदा करती
है,उसी तरह यह भी सच
है कि एक छोटी
सी चींटी भी शक्तिशाली और
विशालकाय हाथी की नाक में
दम कर सकती है।
इसलिए अगर कोई मामूली व्यक्ति हिम्मत और साहस दिखाए
तो बड़े से बड़े सूरमा
को धराशायी कर सकता है।
यह फिल्म एक कोर्ट रूम ड्रामा
है। यह एक ऐसे इंसान की कहानी है जो परम शक्तिशाली इंसान है, जिसके लाखों—करोड़ों
भक्त और प्रशंसक हैं, जो संत के वेष में शैतान है, जिसने एक नाबालिग बच्ची का यौन
शोषण किया है। मामला अदालत तक पहुंचता है।उसके खिलाफ एक मामूली सी लड़की उठ खड़ी होती
है जिसमें सोलंकी जैसा संवेदनशील वकील उसका साथ देता है और वह बाबा को उसके काली करतूत
की सजा दिलाने में कामयाब होता है।
इस फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति की तारीफ की जानी चाहिए जिसने किसी न किसी रूप में इसमें अपना योगदान किया है चाहे वह निर्देशक हो, लेखक हो, कलाकार हो, निर्माता हो या फिर कुछ और। इस फिल्म को ओटीटी प्लेटफार्म Zee5 पर देखा जा सकता है।
© साधना अग्रवाल
Dr Sadhna Agrawal
University Of Delhi

आपका लेख पढ़कर फिल्म देखना पक्का। सारगर्भित समीक्षा के लिए बधाई।
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