© साधना अग्रवाल
राजनीति
के चक्रव्यूह में फंसी महारानी
वेबसीरीज - महारानी
निर्माता- सुभाष कपूर
निर्देशक- करन शर्मा
अभिनय- हुमा कुरैशी, सोहम शाह, अमित सियाल, कानी कुसृति, इनामुल हक, विनीत कुमार, अतुल तिवारी,कानन अरुणाचलम, मोहम्मद आशिक हुसैन
ओटीटी प्लेटफॉर्म- सोनी लिव
अवधि- 10 एपिसोड प्रत्येक लगभग 45 मिनट
यूं तो राजनीति और राजनेताओं पर फिल्में बनती रही हैं लेकिन यह एक जोखिम भरा काम है। क्योंकि साहित्य और फिल्मों में कल्पना के सहारे थोड़ी छूट लेखक और फिल्मकार ले लेते हैं लेकिन उनसे अपेक्षा की जाती है कि तथ्यों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ नहीं करेंगे। चूंकि एक आम नागरिक के मन में उनकी जैसी छवि है, उसका ध्यान रखना भी उनका नैतिक कर्तव्य होता है। और अगर वे ऐसा नहीं कर पाते तो जनता का विश्वास नहीं मिल पाता। कुछ ऐसा ही महारानी सीरीज के साथ हुआ है।
यह सीरीज बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के जीवन से प्रेरित है यद्यपि फिल्मकार ऐसा नहीं मानते और इसे काल्पनिक ठहराने की जिद की जा रही है और अपनी जिम्मेदारी से साफ बच निकलने की कोशिश की जा रही है। जबकि पूरी कहानी, दृश्य और संवाद खुद व खुद इसकी हकीकत बयां कर देते हैं कि यह किससे प्रेरित है। दर्शक न चाहते हुए भी खुद वह खुद इसे राबड़ी देवी से जोड़ कर देखने लगता है। हम सोचने को विवश हैं कि अगर यह राबड़ी देवी से सम्बंधित नहीं है तो बिहार की जगह किसी और प्रदेश को दिखाया जाना चाहिए था। किसी भी व्यक्ति को यदि थोड़ी भी राजनीतिक समझ है तो वह जानता है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले में फंसने के बाद उन्होंने अपनी निरक्षर पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया था।
देश के एक महत्वपूर्ण लेकिन बदनाम प्रदेश बिहार की राजनीति में बीसवीं शताब्दी का अंतिम दशक काफी उथल-पुथल भरा रहा है, जिसमें कुछ ऐसी घटनाएं घटित हुईं जिसने देश की राजनीति को लम्बे समय तक प्रभावित किया।
सत्ता, ताकत और अपराध की राजधानी पटना, जिसको देश में जंगल राज के लिए जाना जाता है, के मुख्यमंत्री भीमा भारती छठ पर्व पर जब अपने गांव आते हैं तो पत्नी रानी भारती उनसे इसलिए नाराज है कि उन्हें राजनीति के आगे घर परिवार की कोई चिंता नहीं है। भीमा रुठी हुई पत्नी को मना लेते हैं । छठ पूजा के अवसर पर भीमा को गोली लगती है और बिहार की राजनीति में भूचाल आ जाता है। लोगों की अपेक्षा के विपरीत बड़े नाटकीय ढंग से भीमा अपनी निरक्षर पत्नी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते हैं। विपक्ष और विरोधी तो आश्चर्य चकित रह ही जाते हैं बल्कि रानी भी हतप्रभ रह जाती है। पहली बार संसद भवन पहुंचने पर वह कहती है- यहां इतने मर्द लोग काहे हैं, हमको ऐसी मर्दाना सरकार का मुख्यमंत्री क्यों बना दिए। यही नहीं जब फाइलों के ढेर पर उसे अगूंठा लगाना पड़ता है तो भी वह असहज महसूस करती है और कहती है- हमसे 50 लीटर दूध दूहा लो, 500 गोबर का गोइठा बनवा लो पर एक दिन में इतना फाइल पर अगूंठा लगाना, ना …., हमसे न हो पाएगा। चूंकि रानी एक मामूली सी औरत थी, जो केवल घर की चारदीवारी तक सीमित थी, ऊपर से निरक्षर, कैसे इतने बड़े राज्य को संभालेंगी? उधर भीमा को यह भरोसा था कि असली सत्ता तो उसके हाथ में होगी ,बस मोहरे के रूप में पत्नी कुर्सी पर बैठेगी और पूरा रिमोट कंट्रोल उसके हाथ में होगा। लेकिन राजनीतिक दांव पेंच के भंवर के बीच रानी भारती अपनी न केवल स्वतंत्र पहचान बनाती है बल्कि वाहवाही भी खूब लूटती है।
इस सीरीज में लेखक और निर्देशक ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भीमा भारती और रानी भारती को ईमानदार और समर्पित नेता के रूप में दिखाया है, यहां तक कि चारा(यहां दाना ) घोटाले प्रकरण को भी ईमानदारी की चाशनी में लपेटकर परोसने की कोशिश की है। क्योंकि सीरीज के आरंभ में ही जो चरित्र भीमा और रानी का उकेरा गया है, उससे भी संभवतः दर्शकों को कहानी नई और फ्रेश लगे। लेकिन जो लोग लालू यादव को थोड़ा भी जानते हैं, उन्हें पता है कि लालू ने पत्नी के कहने पर कभी दूध नहीं बेचा होगा। जबकि यहां भीमा भारती अपनी नाराज़ पत्नी के कहने पर और उसे मनाने के लिए न केवल दूध निकालते हैं, बल्कि दूध बेचते भी हैं।
तथ्यों के साथ छेड़छाड़ एक सीमा तक की जा सकती है। यह सर्वविदित है कि जो
राबड़ी देवी अपने पति की इच्छाओं के विपरीत एक कदम भी नहीं चल सकतीं, यहां
रानी भारती में हिम्मत और साहस इस हद तक आ जाता है कि वह पति की अनुमति के बिना,
खुद
फैसले लेने लगती हैं। बल्कि हद तो तब हो जाती है जब वह अपने पति को जेल की सलाखों
के पीछे धकेल देती हैं और बड़े ही नाटकीय अंदाज में पति से मिलने जेल जाती हैं।
यहां गालियों और अपशब्दों की भरमार आपको अखर सकती है। लगता है कि दाना
घोटाला दिखाने के चक्कर में कहानी में ही घोटाला हो गया है।कई प्रकरण अटपटे लग सकते
हैं मसलन अमूमन किसी राज्यपाल का कार्यकाल 6 साल का होता है लेकिन यहां एक ही राज्यपाल महोदय लगभग 10 सालों से सत्ता पर काबिज हैं। सब कुछ
ठूंस देने के मोह में कहानी पर पकड़ कमजोर हो जाती है। स्त्री सशक्तीकरण के मोह से
भी बच नहीं पाते हैं जो रानी अंगूठाछाप है, वह अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते हस्ताक्षर करना सीख जाती है और घर
की चारदीवारी से निकल कर राज्य की सियासत पर अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने
में कामयाब हो जाती है। इसीलिए तो जिस भीमा भारती का मकसद पत्नी को स्टाम्प बनाकर
सत्ता पर काबिज रहना था, वह
रानी 'साहेब' की बिछाई सियासत की बिसात पर खुद चाल चलने लगती है और बन
जाती है महारानी।
अब बात करें तो इसका निर्देशन तो अच्छा कहा जा
सकता है लेकिन पटकथा काफी कमजोर है और कहानी भटकती नजर आती है। हालांकि संवाद
बढ़िया हैं। हुमा कुरैशी बेहतरीन कलाकार हैं, यहां भी पूरी सीरीज उन्होंने अपने कंधों पर संभाल रखी है और डायलॉग
डिलीवरी में भी सतर्कता रखी है लेकिन कहीं - कहीं फिसल गई हैं। भीमा भारती के रोल
में सोहम शाह ने शानदार प्रदर्शन किया है। विपक्षी नेता नवीन कुमार की भूमिका को
निभाया है अमित सियाल ने, जो
अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहे हैं। वित्त सचिव परवेज़ आलम की
भूमिका में इनामुल हक अच्छे लगे हैं , यह अलग बात है कि बहुत अटपटा लगता है जब वह चोरों की तरह फाइलों की
पड़ताल करते हैं। गौरीशंकर पाण्डेय उर्फ काला नाग के रोल में विनीत कुमार ने उम्दा
काम किया है। बाकी कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है।
यदि आप राबड़ी देवी की बायोपिक समझकर इस सीरीज को देखेंगे तो निराश हो सकते हैं लेकिन यदि नई कहानी के रूप में देखेंगे तो आपको यह सीरीज अच्छी लग सकती है। फिर भी इतना तो कहना जरूरी लगता है कि इसकी लंबाई को कम किया ही जा सकता था।

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