समाज को
धत्ता दिखाती
शादीस्थान
फिल्म - शादीस्थान
निर्देशक- राज सिंह चौधरी
अभिनय- कीर्ति कुल्हारी, निवेदिता भट्टाचार्य, राजन मोदी, मेधा शंकर
संगीत - साहिल भाटिया, नकुल शर्मा
अवधि- 1घंटा 33 मिनट
ओटीटी प्लेटफॉर्म- डिज्नी हाॅटस्टार
सच पूछा जाए तो हम ताउम्र समाज की परवाह करते- करते अपनी तमाम इच्छाओं, खुशियों, उम्मीदों, आकांक्षाओं को ताक पर उठा कर रख देते हैं और अपनी मर्जी से जिंदगी जीने की हसरत और सुकून के पलों के इंतजार में अपनी पूरी उम्र यूं ही गुजार देते हैं। क्योंकि हर वक्त यही ख्याल आता है कि आस-पड़ोस के लोग क्या कहेंगे , नाते - रिश्तेदार क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा? लेकिन कुछ साहसी लोग ऐसे भी होते हैं जो समाज की परवाह करना बंद कर देते हैं और अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीते हैं। तब अहसास होता है कि उन्होंने अपना इतना कीमती वक्त क्यों और किस लिए बर्बाद कर दिया। जाहिर सी बात है कि यही समाज, जिसकी आप इतनी परवाह करते हैं, आपके संकट के समय कभी साथ नहीं देता, तो फिर, जब मुसीबतों का अकेले ही सामना करना है, हम ऐसे समाज की परवाह आखिर क्यों करें? ऐसा कहना आसान तो लगता है, करना उतना नहीं। क्योंकि न चाहते हुए भी गाहे-बगाहे यह समाज हमारी जिंदगी में घुसपैठ करने लगता है। हां, ऐसा किया जा सकता है, यदि आप थोड़ी सी हिम्मत और हौसला दिखाते हैं ।
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर डिजनी हॉटस्टार पर आई डेढ़ घंटे की फिल्म शादी स्थान बहुत ही कम बजट की और साधारण सी फिल्म है। लेकिन एक बड़ा संदेश जरूर दे जाती है। साशा के रूप में कीर्ति कुल्हारी ने पितृसत्ता को कटघरे में खड़ा किया है। हालांकि जितना होना चाहिए वैसा कीर्ति नहीं कर सकी हैं। पितृसत्तात्मक समाज की उपेक्षा करने के लिए कोई जरूरी नहीं कि आप अपनी आजादी के नाम पर गालियां दे, शराब पिए, नशा करें और आवारा घूमें। साशा की मुलाकात एक ऐसे परिवार से होती है जो किसी शादी को अटेंड करने के लिए मुंबई से राजस्थान जाता है। संयोग से उसी शादी स्थान पर साशा और उसके साथी अपने बैंड की परफॉर्मेंस के लिए जाते हैं और एक ही बस में सफ़र करते हैं। क्योंकि किसी कारण से शर्मा परिवार की फ्लाइट छूट जाती है और वे साशा और उसके दोस्तों के साथ शादी में जाते हैं। तो इस तरह आधी फिल्म सफर में ही बीत जाती है जो एक ट्रैवलर बस में ये लोग करते हैं। शर्मा परिवार समाज की परंपराओं और नैतिकताओं के बंधन में जकड़ा हुआ है। जिसमें पत्नी की इच्छा अनिच्छा का कोई मूल्य नहीं है। जैसा उसका पति कहता है, पत्नी वैसा करती रहती है। पति अपनी नाबालिग बेटी की जबरदस्ती शादी कराना चाहता है। बेटी मजबूती से विरोध नहीं कर पाती। पत्नी मजबूर है, पति और बेटी दोनों के बीच हर वक्त सामंजस्य बिठाना चाहती है। उसे अपनी बेटी को खुश तो देखना है लेकिन पति के आगे कुछ बोल नहीं सकती और चुप रहने को मजबूर हैं। उसे हर वक्त यह ध्यान रखना पड़ता है कि पति के गुस्से को कैसे शांत करें और पति को कैसे खुश रखे। एक दिन पत्नी जब साशा को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीते देखती है तो उसमें भी हिम्मत आने लगती है। वह पति से अपने मन की बात कह देती है कि 'भाड़ में गया समाज!'
साशा रोटी बनाती है क्योंकि उसको ऐसा करना अच्छा लगता है और मिसेज शर्मा रोटियां इसलिए बनाती हैं क्योंकि यह उनका कर्तव्य है। के के मेनन की भूमिका इस फिल्म में बहुत छोटी सी है लेकिन वह दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ने में कामयाब होते हैं। पत्नी की भूमिका में निवेदिता भट्टाचार्य का अभिनय अच्छा है। उनके चेहरे पर जो इमोशन, लज्जा, शर्म, घुटन, होनी चाहिए, देखी जा सकती है। अर्शी के रोल में मेधा शंकर अच्छी लगी है और भविष्य में उनसे अपेक्षा की जा सकती है। पति की भूमिका को निभाया है राजन मोदी ने, जिनका काम ठीक-ठाक है। लेकिन इसके निर्देशक राज सिंह चौधरी और उनकी टीम ने निराश किया है। अगर निर्देशन चुस्त -दुरुस्त होता तो यह फिल्म एक नया मुकाम हासिल कर सकती थी।
साहिल भाटिया और नकुल शर्मा का संगीत बहुत ही साधारण है। जबकि इस फिल्म की मुख्य नायिका कीर्ति कुल्हारी और उसके दोस्त एक म्यूजिक बैंड के सदस्य हैं, जो जगह-जगह परफॉर्मेंस देते हैं। उम्मीद थी कि इसका गीत-संगीत मजबूती से सामने आएगा लेकिन वह इस फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष दिखाई देता है। कोई भी गाना ऐसा नहीं है जो आपको फिल्म खत्म होते-होते याद रह जाए। कीर्ति कुल्हारी और उसके सभी दोस्तों के अभिनय को देखकर मुझे मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी बिगड़ैल बच्चे याद आती है। क्योंकि हमारे समाज में यह मान लिया जाता है कि युवा पीढ़ी में संवेदनहीनता खत्म होती जा रही है। जबकि इस फिल्म में भी कीर्ति कुल्हारी और उसके दोस्तों की संवेदनशीलता को सहज ही देखा और महसूस किया जा सकता है। कुल मिलाकर मेरा कहना है कि यह फिल्म ठीक-ठाक है और इसको देखा जा सकता है।
© Dr. Sadhna Agrawal

Comments
Post a Comment