तालिबान और पाकिस्तान में उलझी मलाला
फिल्म : गुल मकई
निर्देशक : अमज़द खान
अभिनय : रीम शेख, अतुल कुलकर्णी, दिव्या दत्ता, ओम पुरी
संगीत : अमज़द खान, अमर मोहिले
अवधि : 132 मिनट
सबसे कम उम्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मलाला ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया था। इस फिल्म को भी मलाला की बायोपिक फिल्म कहकर प्रचारित किया गया। यही कारण था कि इसी आकर्षण के इस फिल्म को देखने अधिकतर लोग जाएंगे लेकिन फिल्म देखकर दर्शक खुद को ठगा महसूस करता है। क्योंकि पूरी फिल्म तालिबान के दहशतगर्दों की पाकिस्तान के स्वात वैली में आतंक फैलाने की है और असली मकसद से बहुत पीछे छूटती ही नजर नहीं आती बल्कि दर्शकों के धैर्य की भी परीक्षा लेती है। कमजोर पटकथा और निर्देशन के यह कायदे से डाक्यूमेंटरी भी नहीं बन पाती।
जब मलाला को नोबेल पुरस्कार मिला तो उसके जीवन—संघर्ष को जानने की भी उत्सुकता हुई। दरअसल मलाला न केवल अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती है बल्कि लड़कियों की
पढ़ाई के भी पक्ष में है। किशोरी मलाला अपने पिता जियाउद्दीन यूसुफजई, जो लड़कियों के स्कूल में प्रिंसिपल हैं, से पूछती है कि इन तालिबानियों को शिक्षा से इतनी नफरत क्यों है? तो पिता उसे बताते हैं कि क्योंकि जो लोग शिक्षित होते हैं, उन्हें जिहाद या गलत हदीस की ओर ले जाना मुश्किल होता है।' दरअसल यदि हम याद करें तो हिटलर को भी लोगों के शिक्षित हो जाने का डर था इसीलिए उसने भी सारे शिक्षण संस्थानों को नष्ट करवा दिया था। और वैसे भी यदि एक लड़की को शिक्षा मिलती है तो पूरा परिवार ही शिक्षित नहीं होता बल्कि देश भी प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ता है।
इस फिल्म को देखकर बार—बार यह ख्याल आता है कि मलाला के बहाने पूरी फिल्म में
तालिबान के दहशतगर्दों की पाकिस्तान के स्वात वैली में आतंक फैलाने की कहानी पर ज्यादा फोकस आखिर करने की मंशा क्या थी ? हालांकि मलाला ने तालिबान के दहशतगर्दों का बहुत बहादुरी से सामना किया था लेकिन मलाला की असली कहानी को दबाकर आतंक को उभारने का कोई औचित्य नजर नहीं आता।
इतना खून—खराबा देखकर न केवल समय बर्बाद होता है बल्कि पैसा भी। विषय का चुनाव अच्छा होने से ही कुछ नहीं होता, उसको परिणति तक भी पहुंचाना पड़ता है। यह फिल्म औसत दर्जे की भी नहीं बन पाई है। मलाला के पिता जियाउद्दीन यूसुफजई के रोल में अतुल कुलकर्णी और मां की भूमिका में दिव्या दत्ता ने अच्छा काम किया है। चूंकि मलाला गुल मकई के नाम से ब्लॉग लिखती थी क्यांकि इतने खौफ भरे माहौल में वह अपने नाम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं कर सकती थी लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई।
©Dr.
Sadhna Agrawal
Film
Critic & Asst. Prof (DU)

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