UJDA CHAMAN REVIEW



निर्देशक : अभिषेक पाठक
अभिनय : सनी सिंह, मानवी गगरू, सौरभ शुक्ला
संगीत : गौरवरौशिन, गुरू रंधावा
गीत : देवशी खंडूरी,गुरू रंधावा
वधि : 120 मिनट
रेटिंग : 2 स्टार


       सौंदर्य की परिभाषा क्या है या क्या होनी चाहिए ? इस सवाल का मोटामाटा उत्तर अधिकांश लोग बाहरी सौंदर्य यानी आकर्षक रूपरंग, कदकाठी को मानते हैं और आंतरिक सौंदर्य पर तो ध्यान देते हैं और ही उस व्यक्ति को समझने की कोशिश ही करते हैं। हर व्यक्ति की यह इच्छा होती है कि उसकी होने वाली पत्नी सबसे ज्यादा खूबसूरत हो,बल्कि उसके परिवार वाले भी यही चाहते हैं। चाहे वह खुद कैसा भी दिखता हो। अभी तक इन तमाम परेशानियों का सामना अधिकतर लड़कियों को करना पड़ता था लेकिन अब लड़कों को भी इनसे गुजरना पड़ रहा है। इस संदर्भ में मुझे आनंद बक्शी का लिखा और राजेश खन्ना पर फिल्माया रोटी फिल्म का वह गीत याद आता हैगोरे रंग पर इतना गुमान कर/ गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा।
                          इसी समस्या पर केन्द्रित निर्देशक अभिषेक पाठक की यह फिल्म है बल्कि इसी थीम पर अगले ही सप्ताह 'बाला' नामक फिल्म भी रही है। इस फिल्म का हीरो दिल्ली के राजौरी में रहने वाला चमन कोहली (सनी सिंह) की शादी की उम्र हो गई है लेकिन उसे उसके गंजेपन के कारण लड़कियां रिजेक्ट कर देती हैं क्योंकि वह मेट्रीमोनियल साइड पर कभी अपनी पुरानी फोटो डालता है, तो कभी आधी फोटो डालता है। चमन के परिवार वाले भी उसकी शादी को लेकर परेशान हैं। परेशान होकर चमन अपनी प्रोफाइल वहां से डिलीट कर देता है और टिंडर पर अपनी प्रोफाइल बना लेता है, जो कि एक डेटिंग साइट है। इसी क्रम में उसकी मुलाकात अप्सरा (मानवी गगरू) से होती है। अप्सरा मोटी है और चमन गंजा। मन ही मन दोनों एकदूसरे की कमियों को देखते और कोसते हैं। दोनों एकदूसरे को नापसंद कर देते हैं। लेकिन संयोग से अप्सरा चमन से शादी करने के लिए तैयार हो जाती है क्योंकि उसका सोचना है कि बाहरी सौंदर्य कोई मायने नहीं रखता। अगर शादी के बाद वह मोटी हो जाए या फिर चमन के बाल झड़ जाएं तो फिर इन चीजों का कोई मतलब नहीं है। लकिन चमन को ये सारी चीजें समझ नहीं आतीं। उसे लगता है कि पत्नी अगर दुबलीपतली, गोरी और लंबी हो तो लोग उसका और मजाक उड़ाएंगे।
                        चमन के माध्यम से एक बात यह उभर का सामने आती है कि समाज के दबाव में या फिर लोगों को दिखाने के लिए भी लड़के के मन में यह प्रेशर रहता है कि उसकी पत्नी दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो। मानो पत्नी हो गई कोई सजावटी गुड़िया हो।
            इस फिल्म की थीम तो अच्छी है लेकिन निर्देशक इसको संभाल नहीं पाए और यह एक बेहद लचर और कमजोर फिल्म बनकर रह गई है। चूंकि फिल्म हमारे समाज का एक सशक्त माध्यम है जो काफी हद तक लोंगों की सोच पर प्रभाव डालता है। एक बात परेशान करती है कि जिस हिंदी की बदौलत पूरा फिल्म उद्योग फलफूल रहा है,उसको और उसके पढ़ाने और पढ़ने वालों को इतना दीनहीन आखिर क्यों दिखाया जाता है। जबकि सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हो चुका है कि हिंदी पूरे विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है, ऐसे में उसकी उपेक्षा करना उचित नहीं। इस फिल्म में चमन को दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित हंसराज कालेज का हिंदी का प्रोफेसर दिखाया गया है। लेकिन वह बहुत दबे स्वर में बताता है कि वह हिंदी का प्रोफेसर है जिसे सुनकर लोग अजीब सी प्रतिक्रिया देते हैं। दूसरी एक बड़ी अखरने वाली बात यह है कि चमन जब क्लास में पढ़ाने जाता है तो उसके हाथ में टेक्स्ट बुक होकर कुंजी थमा दी जातीहै जोकि आपत्तिजनक है और इसका एक गलत संदेश दूर तक जाता है।
              चमन की भूमिका में सनी सिंह ने ठीकठाक काम किया है इससे पहले वह सोनू के टीटू की स्वीटी में भी दिख चुके हैं। लेकिन अप्सरा की भूमिका को मानवी गगरू ने बेहतरीन ढंग से निभाया है और वह अपनी स्पष्ट छाप दर्शकों पर छोड़ने में कामयाब रही हैं। वह आत्मविश्वास से भरी और आकर्षक लगी हैं। ज्योतिष की भूमिका में सौरभ शुक्ला का काम ठीक है। इसका गीतसंगीत कमजोर है।



© Dr. Sadhna Agrawal
          

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