फिल्म :
खानदानी शफाखाना
निर्देशक : शिल्पी दास गुप्ता
अभिनय : सोनाक्षी सिन्हा, बादशाह, वरुण शर्मा, प्रियांश जोरा, अन्नू कपूर, कुलभूषण खरबंदा, नादिरा जहीर बब्बर
अवधि : 138 मिनट
शिल्पी दास गुप्ता ने एक बेहद बोल्ड विषय पर निर्देशक के रूप में फिल्म खानदानी शफाखाना से डेब्यू किया है। हमारे समाज में आज भी सेक्स पर खुलकर बात करना एक टैबू समझा जाता है और यदि कोई लड़की इस पर बात करे तब तो यह और भी बुरी बात मानी जाती है। क्योंकि एक लड़की की खूबी इसी में है कि वह अपनी तमाम इच्छाओं को दफन करके सती—सावित्री की तरह व्यवहार करे। तो जब समाज में यह धारणा बनी हुई है तो इस पर बात करने की हिम्मत कोई लड़की कैसे कर सकती है। फिर इसमें तो सोनाक्षी सिन्हा को शफाखाना चलाने की जिम्मेदारी मिल जाती है। जिसे न तो उसके परिवार वाले पंसद करते हैं और न ही समाज के लोग यह बर्दाश्त कर पाते हैं कि एक लड़की होने के नाते वह सेक्स पर बात करे।
इस फिल्म में कॉमेडी का तड़का लगाने की कोशिश की गई है लेकिन हास्य पैदा करने की जगह फूहड़ता ही दिखाई देती है। इस फिल्म का विषय तो अच्छा है लेकिन इसकी पटकथा में तमाम झोल हैं और कमजोर निर्देशन के कारण कोई बात करने तक के लिए तैयार नहीं होता चाहे इसकी नायिका बॉबी बेदी यानी सोनाक्षी सिन्हा तमाम कोशिश करती है कि लोग सेक्स पर बात तो करें। बल्कि बात तो करो के पर्चे भी छपवा कर पूरे शहर में बंटवा देती है। यही नहीं बॉबी बेदी जब सेक्स,
शीघ्रपतन, स्खलन, गुप्त रोग जैसे विषयों पर बात करती है तो उसे लोगों की घृणा और विरोध
सहना पड़ता है।
दरअसल बॉबी बेदी यह शफाखाना अपनी इच्छा से नहीं चलाती बल्कि लाचारी और विवशता के कारण चलाती है। बॉबी बेदी पंजाब के एक छोटे से शहर होशियारपुर में मेडिकल सेल्स रिप्रंटेटिव का काम करती है। घर पर वह मां (नादिरा जहीर बब्बर) और निकम्मे भाई भूषित बेदी (वरुण शर्मा) के साथ रहती है। उसकी बहन की शादी के खर्चे के लिए उधार लिए पैसे न लौटाने के कारण चाचा उनका घर हड़पना चाहता है। तभी उसके मामा हकीम ताराचंद (कुलभूषण खरबंदा) अपना पुश्तैनी शफाखाना वसीयत में बॉबी बेदी के नाम कर जाते हैं लेकिन शर्त भी लगा देते हैं कि यह जायदाद उसे तभी मिलेगी जब वह इसे 6 महीने चलाएगी। अब बॉबी बेदी के सामने
इस शफाखाना को चलाने की मजबूरी है चाहे किसी को कितना भी ऐतराज क्यों न हो।
सोनाक्षी सिन्हा ने बॉबी बेदी का किरदार अच्छे से निभाया है। चूंकि इस किरदार से जिस साहस की दरकार थी वह साहस उनके चेहरे पर दिखाई नहीं देता। मां के रोल में नादिरा जहीर बब्बर का काम सराहनीय है। वरुण शर्मा के हिस्से फूहड़ता ही अधिक आई है इसीलिए वह कोई प्रभाव नहीं छोड़ते। प्रियांश जोरा कम समय पर्दे पर दिखाई देते हुए भी प्रभावशाली लगे हैं। कुलभूषण खरबंदा की भूमिका छोटी होते हुए भी पूरे समय उनकी उपस्थिति दिखाई देती है।
इसका गीत—संगीत साधारण है। विषय अच्छा है लेकिन कमजोर निर्देशन के कारण यह फिल्म चलताउ और सड़क छाप होकर रह जाती है। इसी लिए यह खानदानी शफाखाना झोलाछाप बन जाता है। कोर्ट रुम में ऐसी फूहड़ता दिखाना पता नहीं किसका आइडिया था। जहां न गरिमा का ख्याल रखा गया न ही स्थान का।
एक और बात
कहना मुझे जरुरी लगता है कि जहां इसमें एक तरफ सेक्स एजुकेशन पर बल देने की कोशिश की गई है वहीं दूसरी तरफ अनजाने में ही सही सड़क छाप तंबू में गुप्त रोगों का इलाज करने वालों को बढ़ावा दिया गया है जो उचित नहीं लगता। और बात तो करो की रट की जगह लोग कोई बात नहीं करना चाहते।
© Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof (DU)

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