आओ मार्स पर चलें
फिल्म : मिशन मंगल
निर्देशक : जगन शक्ति
अभिनय : अक्षय कुमार, विद्या बालन, तापसी पन्नू, सोनाक्षी सिन्हा, शरमन जोशी, कीर्ति कुल्हाड़ी, नित्या मैनन, एचजी दत्तात्रेय, दिलीप ताहिल, संजय कपूर
संगीत : अमित त्रिवेदी
अवधि : 133 मिनट
मिशन मंगल से बतौर निर्देशक डेब्यू करने वाले जगन शक्ति अपनी इस फिल्म से दर्शकों में यह विश्वास पैदा करने में सफल रहे हैं कि नए लोग भी बेहतर कर सकते हैं। हालांकि वे पैडमैन, डियर जिन्दगी, पा, चीनी कम में सहायक निर्देशक के तौर पर काम कर चुके हैं, इसलिए उनके पास अनुभव की कमी नहीं है लेकिल अपने अनुभवों और अपनी रचनात्मकता के तालमेल से वह एक अच्छी फिल्म को दर्शकों के सामने लाए हैं, इसलिए भी बधाई के पात्र हैं।
दरअसल मंगलयान हमारे देश की एक ऐसी उपलब्धि है जिस पर समस्त देशवासी ही गर्व महसूस नहीं करते हैं बल्कि जिससे दुनिया में हमारे होनहार वैज्ञानिकों की काबलियत की धूम मच गई थी। बल्कि जो बड़ी बात है वह यह कि महिला वैज्ञानिकों ने इस मिशन को पूरा करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। मंगलयान पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था— (जो इस फिल्म के अंत में भी दिखाया गया है—) ' आटो रिक्शा से यात्रा करने पर 10 रु0 प्रति किलोमीटर के हिसाब से किराया लगता है जबकि भारतीय वैज्ञानिकों ने 7 रु0 प्रति किलोमीटर के खर्चे पर मंगल तक की दूरी तय कर ली।' दिलचस्प बात यह भी है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने बजट की कमी के चलते इसका बजट आधा कर दिया था लेकिन हमारे वैज्ञानिकों ने खासकर महिला वैज्ञानिकों
के रहते इतने कम बजट में बिना थके, बिना रुके और बिना हतोत्साहित हुए एक ऐसा करिश्मा कर दिखाया
कि हम बस इसे घटते हुए अपलक देखते रह जाते हैं। ऐसा नहीं है कि उनके रास्तें में अड़चने
नहीं थीं, या फिर चुनौतियां कम थीं लेकिन जैसा कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम
की नसीहत कि—'सपने
खुली आंखों से देखना चाहिए', उन्हें प्रेरणा भी देता है और हौंसले के साथ उम्मीद भी।
यद्यपि हमें पहले से मालूम होता है कि मंगलयान सफलतापूर्वक मार्स पर पहुंच जाता है लेकिन फिर भी इस फिल्म में अंत तक हमारी रोचकता भी बनी रहती है और उत्सुकता भी और अपने दिलों की धड़कन थामे हम उसकी सफलता की कामना करते हैं और जब सफलता मिलती है तो जितनी खुशी हमारे वैज्ञानिकों को हुई थी, उतनी ही एक भारतीय होने के नाते हमें भी होती है। यह अच्छी बात है कि इस सफलता का श्रेय किसी एक को नहीं बल्कि इसरो में काम करने वाले 17000 वैज्ञानिकों को दिया जाता है। इस फिल्म को देखते हमारा माथा गर्व से उंचा उठ जाता है और हमें अपने वैज्ञानिकों पर नाज़ होता है कि उनकी वर्षों की मेहनत सफल हुई।
हमेशा की तरह इस फिल्म में
भी अक्षय कुमार ने वैज्ञानिक राकेश धवन की भूमिका को बढ़िया ढंग से निभाया है। शुरू
में लगता है कि वह इस फिल्म के मुख्य किरदार होंगे लेकिन तारा के रोल में विद्या बालन
उनसे किसी भी सूरत में कमतर नहीं लगी बल्कि कहना चाहिए कि बाजी उन्होंने मार ली। स्वाभाविक
रूप से एक स्त्री को दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है—एक तरफ उसे घर—परिवार
संभालना होता है तो दूसरी ओर अपना कार्यक्षेत्र। तापसी पन्नू, सोनाक्षी सिन्हा, शरमन
जोशी, कीर्ति कुल्हाड़ी, नित्या मैनन, एचजी दत्तात्रेय आदि वैज्ञानिकों की भूमिका में
अच्छे लगे हैं और बीच—बीच में जानदार संवादों के
माध्यम से खूब मनोरंजन भी किया है। नासा से लौटे वैज्ञानिक की भूमिका दिलीप ताहिल ने
और तारा के पति की भूमिका में संजय कपूर अच्छे
लगे हैं।
फिल्म के अंत में आया गाना 'शाबासियां'
सचमुच में बहुत अच्छा लगता है और साथ में गुनगुनाने को ही नहीं इसरो के वैज्ञानिकों
को शाबासी देने का मन भी करता है। 15 अगस्त के अवसर पर आई एक शानदार फिल्म को इसलिए
भी अवश्य देखा जाना चाहिए जिससे कि हमें भी पता हो कि हमारे वैज्ञानिकों ने देश को
पूरी दुनिया में अग्रिम पंक्ति में खड़ा करने के लिए किस तरह रात—दिन
एक करके यह सफलता हासिल की। यह फिल्म एक संदेश भी छोड़ जाती है कि हमें किसी भी काम
को करने के लिए 9 से 5 की नौकरी की तरह नहीं बल्कि अपने सपने को पूरा करने के लिए करना
चाहिए तभी सफलता हमारे हाथ लगेगी। और जब यह भावना हमारे अंदर आ जाती है तो उसमें चाहे
कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं, उन सभी को पार करते हुए हम अपनी मंजिल पा ही सकते
हैं। जय हिंद! जय भारत!
© Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof (DU)

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