चुनौतियों का सामना कर आगे बढ़ते आनंद कुमार
फिल्म : सुपर 30
निर्देशक : विकास बहल
अभिनय : ऋतिक रोशन, मृणाल ठाकुर, पंकज त्रिपाठी, आदित्य श्रीवास्तव, वीरेन्द्र सक्सेना, नन्दिश सिंह सन्धू
संगीत : अजय अतुल
गीत : अमिताभ भट्टाचार्य
अवधि : 154 मिनट
यह फिल्म बिहार के सुपरिचित गणितज्ञ आनंद कुमार के जीवन पर आधारित है। बेहद होनहार आनंद कुमार को अपनी काबलियत के बलबूते कैम्ब्रिज में एडमिशन तो मिल जाता है लेकिन गरीबी के कारण वह वहां नहीं जा पाते और उनका सपना टूटकर बिखर जाता है। एक दिन सड़क पर लैंपपोस्ट की रोशनी में पढ़ाई करते एक गरीब बच्चे पर उनकी नजर जाती है तो उनको उस बच्चे में अपना सपना पूरा होता दिखाई देता है। साथ ही अपने मृत पिता की कही बात उनके कानों में गूंजने लगती है कि—'अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा बल्कि राजा वह बनेगा जो इसका हकदार होगा।' तभी आनंद कुमार ऐसे 30 गरीब बच्चों को पढ़ाने—लिखाने, खिलाने—पिलाने, रहने आदि की जिम्मेदारी उठा लेते हैं ताकि वे बच्चे आईआईटी जाकर पढ़ाई कर सकें और अपने सपनों को पूरा कर सकें। उनके इस काम में अनेक बाधाएं आती हैं, उनको जान से मारने की कोशिश भी की जाती है लेकिन आनंद कुमार हिम्मत नहीं हारते।
इस फिल्म में धीमे से लेकिन मजबूती से परिवार की ताकत और महत्व को दर्शाया गया है। माना भी जाता है कि यदि बुरे समय में या हताशा और निराशा के समय मनुष्य को यदि उसके परिवार का साथ मिल जाए तो वह कुछ भी कर गुजर सकता है। आनंद कुमार का साथ पहले उनके पिताजी ने अपने भरसक दिया था लेकिन उनकी असमय मृत्यु ने एक मजबूत सहारा छीन लेने के बावजूद उनका छोटा भाई और मां ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा और कदम से कदम मिलाकर उनके हौसले को बरकरार रखा। मां ने कभी भी उन 30 बच्चों का खाना बनाने में नाक—भौं नहीं सिकोड़ी। उपर से देखने पर यह कोई बड़ी बात नहीं लगती लेकिन आज के समय में यह बहुत बड़ी बात है। जिनका अपना खुद का जीवन मुश्किलों से भरा हो, वे स्वयं परेशानियों का सामना करके भी दूसरों के सपनों को पूरा करने में अपनी पूरी जिन्दगी लगा दें।
आनंद कुमार की भूमिका को पर्दे पर निभाया है ऋतिक रोशन ने, जो सचमुच सराहनीय है क्योंकि उन्होंने बिहार की बोली—वानी, रहन—सहन इस कदर आत्मसात कर लिया है कि बिल्कुल आनंद कुमार लगते हैं। यह फिल्म उन्हें सफलता की ओर एक कदम आगे बढ़ाती है। पिता की भूमिका में वीरेन्द्र सक्सेना का काम भी बढ़िया है जो अपने बच्चों के सपनों को पूरा करना चाहता है न कि अपने सपनों को उन पर थोपना। आनंद कुमार के भाई बने नन्दिश सिंह सन्धू और मंत्री की भूमिका में पंकज त्रिपाठी का काम शानदार है। मृणाल ठाकुर प्यारी और संजीदा लगी हैं। लेकिन एक्सिलैंस कोचिंग चलाने वाले लल्लन यानी आदित्य श्रीवास्तव हमारे दिमाग पर छा जाते हैं।
इस फिल्म का गीत—संगीत साधरण है। लेकिन यह तो कहना ही पड़ेगा कि इसकी लंबाई को कम करने की जरूरत थी। यही कारण है कि जहां इंटरवल से पहले फिल्म दर्शकों को अपनी गिरफ्त में लेती है वहीं बाद में यह थोड़ी बिखरने लगती हैऔर कहीं—कहीं बोरियत भी होने लगती है। खासकर सुपर 30 के बच्चों द्वारा होली के अवसर पर परफॉरमेंस। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जहां आनंद कुमार को पिता की मृत्यु के बाद पापड़ बेचकर जीवन—यापन करना पड़ता है तो फिर वे 30 गरीब बच्चों की पूरी जिम्मेदारी कैसे उठा लेते हैं ? उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिलती। उनका भाई और मां भी हर वक्त उनके साथ काम में लगे रहते हैं। यहीं एक और सवाल भी उठना लाजिमी है कि जब फिल्म में एक जगह एक अमीर बच्चा उनसे कहता है कि वह भी उनसे पढ़ना चाहता है। इसमें मेरी क्या गलती कि मैं अमीर घर में पैदा हुआ हूं और आनंद कुमार निरूत्तर हो जाते हैं। दरअसल आनंद कुमार को
एक बात चुभ गई थी कि एकलव्य होनहार होने के बावजूद अर्जुन से आगे नहीं बढ़ पाता क्योंकि
गुरू द्रोणाचार्य उससे गुरूदक्षिणा के नाम पर अगूंठा मांग लेते हैं ताकि एक राजा का
बेटा ही राजा बने। इसीलिए आनंद कुमार
चाहते हैं कि राजा वही बने जो इसका असली हकदार है। लेकिन वह भूल जाते हैं कि प्रतिभा कहीं भी और किसी भी वर्ग के बच्चे में हो सकती है। कोई जरूरी नहीं कि हर गरीब बच्चा होशियार ही हो और हर अमीर बच्चा बिगड़ैल। एक शिक्षक का यह कर्तव्य होता है कि वह बिना किसी भेदभाव के अपने ज्ञान से उचित मार्ग दर्शन करे और उन्हें पढ़ाए।
खैर जिन आनंद कुमार और उनके सुपर 30 के बारे में लोगों को संपूर्णता में जानने की इच्छा थी, काफी हद तक यह फिल्म पूरा करती है।
-© Dr Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst Prof.
Delhi University

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