Nakkaash Film Review- धार्मिक उन्माद के बीच फंसा नक्काश



फिल्म : नक्काश
निर्देशक : जैगम इमाम
अभिनय : इनामुलहक, शरीब हाशमी, कुमुद मिश्रा, राजेश शर्मा, पवन तिवारी
संगीत :  अमन पंत
गीत : आलोक श्रीवास्तव
अवधि : 125 मिनट
रेटिंग : 3 स्टार

               हिंदू और मुस्लिम धर्म के वैमनस्य को सामने लाते हुए जैगम इमाम एक बार फिर सामने हैं अपनी नई फिल्म नक्काश के बहाने। इससे पहले भी हम उनकी दोजख और अलिफ जैसी फिल्में भी देख चुके हैं। एक संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाना कोई आसान काम नहीं है लेकिन जैगम इमाम यह हौंसला रखते हैं और जो कहना चाहते हैं, वह आसानी से कह देते हैं,यही उनकी सफलता है। यह कैसी विडम्बना है कि मनुष्यों को बनाने वाला ईश्वर कोई भेदभाव नहीं करता लेकिन उसके बनाये बन्दे धर्म और जाति की आड़ में एकदूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं।

        बनारस शहर के एक मंदिर के निर्माण में वेदांती महाराज (कुमुद मिश्रा) एक बहुत ही होनहार नक्काश अल्लाह रक्खा (इनामुलहक) से काम करवाते हैं क्योंकि उसके पुरखे भी इस काम को करते आये हैं और इस कला को जानने वाला और कोई नहीं है।  लेकिन उनका बेटा मुन्ना (पवन तिवारी) को यह नक्कश पसंद नहीं है। अल्लाह रक्खा भी बहुत मेहनत और लगन से इस काम को पूरा करने में लगा है। लेकिन अल्लाह रक्खा को कदमकदम पर विरोध झेलना पड़ता है। एक ओर जहां उसकी कौम के लोग उसे काफिर कहतेहैं ,वहीं हिंदुओं को इस बात का ऐतराज है कि उनके मंदिर में एक मुसलमान कैसे काम कर सकता है इसीलिए उसे सबसे बचते हुए रात के अंधेरे में ही नहीं जाना पड़ता बल्कि अपनी वेशभूषा भी बदलनी पड़ती है। उसका जिगरी दोस्त समद (शरीब हाशमी) की भी केवल नियत बिगड़ती है बल्कि वह उसे धोखा भी  देता है।

          इस फिल्म में अल्लाह रक्खा की भूमिका को इनामुलहक ने केवल जिया है बल्कि पूरी तरह आत्मसात भी किया है इसलिए विश्वसनीय लगते हैं। उनके शानदार अभिनय को देखकर कहा सकता है कि उन्होंने अपने किरदार को पूरी तरह पकड़ कर रखा है। शरीब हाशमी का काम भी अच्छा है कि कैसे एक आम मनुष्य होने के कारण उसके मन में लालच जाता है जिस कारण वह केवल दोस्त को धोखा देता है बल्कि समाज में धार्मिक उन्माद बढ़ाने में अपना योगदान देता है। वह अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए धर्म का सहारा लेता है। मंदिर के पुजारी की भूमिका में कुमुद मिश्रा ने अपने काम को बढ़िया तरीके से किया है खासकर जब वह कहते हैं कि राजनीति धर्म नहीं कर्म होना चाहिए। पुलिस अफसर की भूमिका में राजेश शर्मा भी जमे हैं। पवन तिवारी मुन्ना भैया के रोल में अच्छे लगे हैं।

          यह फिल्म बताना चाहती है कि कुछ मुट्ठी भर लोग अपने स्वार्थों के लिए धार्मिक कट्टरता की ओट में समाज में केवल उन्माद, वैमनस्य, डर, हत्या, अपराध, नृशंसता, अमानवीयता, दुश्मनी जैसी बातों को बढ़ाते हैं जिससे किसी का भी भला नहीं होने वाला। इस तरह की फिल्मों की समाज को बहुत जरुरत है। जैगम इमाम की तारीफ करनी होगी कि वह निरंतर इस तरह के विषय पर काम कर रहे हैं बल्कि एक छोटी सी कोशिश भी कर रहे हैं कि समाज में परिवर्तन लाने की। हालांकि ऐसा नही है कि पूरी फिल्म में सब कुछ अच्छा ही है लेकिन उनको नजर अंदाज करने में कोई बुराई नहीं दिखती।  



Dr Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst Prof. 
Delhi University

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