फिल्म : सैटर्स
निर्देशक : अश्विनी चौधरी
अभिनय : श्रेयस तलपड़े, आफताब शिवदासानी, सोनाली सहगल, ईशिता दत्ता, पवन मल्होत्रा
संगीत : सलीम सुलेमान
अवधि : 126 मिनट
रेटिंग : ⭐⭐ स्टार
हमारी शिक्षा प्रणाली में कितना भ्रष्टाचार फैला हुआ है, या इसका व्यावसायिकरण हो चुका है या फिर इसमें एक पूरा माफिया जगत घुस गया है जैसे विषय पर फिल्म बनाना कोई नया विषय नहीं है। यदि हम थोड़ा पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म की याद आ जाती है। दरअसल माता—पिता की महत्वाकांक्षा और अपने बच्चों पर अपनी चाहत थोपना इसका एक बड़ा कारण दिखाई देता है। अभी हाल ही में आई फिल्म व्हाई चीट इंडिया फिल्म भी इसी विषय पर आधरित थी। उसमें भी इमरान हाशमी
गरीब मेधावी बच्चों की मदद से अमीर बच्चों के बदले पेपर दिलवाता है और उनका एडमिशन करवाता है जिसकी एवज में कुछ पैसे उन्हें देता है। बाद में इमरान हाशमी और आगे बढ़कर एमबीए में भी यही फार्मूला अपनाता है बल्कि पेपर लीक भी करता है।
निर्देशक अश्विनी चौधरी की इस फिल्म में भी कहानी में कोई नई बात नहीं है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि बनारस में बैठे सैटर्स देश भर में होन वाली विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कैसे सैटिंग करते हैं उनमें चाहे पेपर लीक करना हो या फिर एक्जाम में डमी बच्चों को तैयार करना हो जैसे खेल चलते हैं जिसमें कई लोग शामिल हैं बल्कि कई कोचिंग सेंटर भी इसमें भाग लेते हैं। बनारस शहर में बैठा शिक्षा माफिया का सरताज है भैया जी (पवन मल्होत्रा )जिसके लिए काम करता है अपूर्वा (श्रेयस तलपड़े)। वह अपनी एक टीम बनाता है लेकिन भैया जी से अनबन होने के बाद अपूर्वा अलग से यह काम करता है। उसे पुलिस से तो बचना ही होता है साथ में भैया जी से भी मुकाबला करना होता है।
भैया जी की भूमिका में पवन मल्होत्रा ने बेहतरीन काम किया है। उनकी शान—ओ—शौकत, चलने—फिरने का ढंग हो या फिर चेहरे पर मक्कारी झलकती है, सब कुछ अच्छे से किया है। वहीं अपूर्वा के रोल में श्रेयस तलपड़े खूब जमे हैं क्योंकि तमाम कारगुजारियों के बावजूद उनके भीतर मनुष्यता दिखाई देती है। लेकिन पुलिस अधिकारी के रूप में आफताब शिवदासानी थोड़े कमजोर नजर आते हैं। वहीं पर्दे पर सोनाली सहगल से कम दिखाई पड़ने वाली ईशिता दत्ता बाजी मार लेती हैं।
ऐसी फिल्मों में गीत—संगीत की ज्यादा गुजाइंश नहीं होती है और निर्देशक को भी इस मोह से बचना चाहिए लेकिन न चाहते हुए भी इसमें गाना सुनाई तो देता है लेकिन दर्शकों पर कोई असर नहीं छोड़ता और बेहद साधारण बनकर रह जाता है।
इसकी कहानी पुरानी होने के बावजूद भी इसका ट्रीटमेंट अच्छा किया गया है। आज हमारी शिक्षा व्यवस्था किस कदर खोखली होती जा रही है बल्कि कहें कि शिक्षा के नाम पर कोचिंग सेंटर फल—फूल रहे हैं और मेधावी बच्चों के साथ अन्याय हो रहा है, इसको बखूबी दिखाती है। तकनीक के इस युग में सैटर्स भी कितने अपडेट हो गये हैं, इसको भी सामने लाया गया है बल्कि कहें कि नये—नये गैजेट्स ने इनके काम को कितना आसान कर दिया है कि देखकर हैरानी होती है।
©Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof (DU)

Better than cheat India.
ReplyDeleteNice ma'am
Very well written..
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