फिल्म : पीएम नरेन्द्र मोदी
निर्देशक : उमंग कुमार
अभिनय : विवेक ओबरॉय, मनोज जोशी, जरीना बहाब, राजेन्द्र गुप्ता, बोमन ईरानी
अवधि : 136 मिनट
रेटिंग : ⭐⭐स्टार
इधर
यह देखने में आ रहा है
कि लोग बायोपिक फिल्मों को देखना खूब
पसंद करते हैं हालांकि ऐसी फिल्में बनाना एक जोखिम भरा
काम ही नहीं है
बल्कि बहुत परिश्रम की भी मांग
करता है। निर्देशक उमंग कुमार मैरी कॉम और सरबजीत जैसी
सफल बायोपिक फिल्में बना चुके हैं। यह फिल्म पीएम
नरेन्द्र मोदी के जीवन पर
आधारित है जिसको पहले
ही रिलीज होना था लेकिन चुनाव
आयोग ने देश में
होने वाले चुनावों के मद्देनजर इसे
चुनाव सम्पन्न होने तक आगे खिसका
दिया था। और कमाल देखिए
कि 23 मई को भारी
बहुमत से जीत हासिल
कर नरेन्द्र मोदी दोबारा से पीएम बनने
जा रहे हैं तब यह फिल्म
दर्शकों के लिए रिलीज
हो रही है, जो उचित ही
है। फिर भी विवादों से
बचने के लिए सावधानी
के तौर पर शुरू में
ही लंबा—चौड़ा डिस्क्लेमर देकर निर्माताओं ने खुद को
जवाबदेही से मुक्त रखने
की कोशिश अवश्य की है।
यह
फिल्म नरेन्द्र मोदी के बचपन से
लेकर प्रधानमंत्री बनने तक की कहानी
है। फिल्म की शुरूआत 2013 में
नरेन्द्र मोदी के बीजेपी उम्मीदवार
घोषित होने से होती है
जो दर्शकों को फ्लैशबैक में
मोदी के बचपन में
लेकर चली जाती है। जब मोदी रेलवे
स्टेशन पर चाय बेचा
करते थे। मोदी के पिता की
चाय की दुकान थी
और मां लोगों के घरों में
बर्तन मांजने का काम किया
करती थी। थोड़ा बड़ा होने पर मोदी गौतम
बुद्ध के जीवन से
प्रभावित होकर हिमालय की चोटियों पर
अपने जीवन के लक्ष्य को
पहचानने के लिए निकल
जाते हैं। बाद में वह आरएसएस के
कार्यकर्ता बनकर गुजरात की राजनीति में
कदम रखते हैं। उसके बाद वह कभी पीछे
मुड़कर नहीं देखते चाहे जीवन में कितनी भी परेशानियों का
सामना करना पड़ा हो। अपनी सफल कूटनीति के चलते वह
देश की राजधानी दिल्ली
में पीएम बनकर देश को एक नई
उंचाइयों तक पहुंचाने का
सपना देखते ही नहीं बल्कि
कामयाब भी होते हैं।
यह
फिल्म केवल मोदी जी के प्रशंसकों
को ही नहीं, उनके
विरोधियों को भी इसलिए
देखनी चाहिए ताकि उन्हें मोदी जी की कार्यशैली
और बारीकियों का पता चल
सके। इस फिल्म के
माध्यम से बताया गया
है कि किस तरह
देश को विकास के
पथ पर ले जाया
जा सकता है। कहा भी जाता है
कि राजनीति कांटों से भरा ताज
है। राह में कितनी भी अड़चनें क्यों
न आयें, विरोधी कितने भी जाल बिछा
ले लेकिन थोड़ी सी सूझबूझ से
आप उसको कैसे चारों खाने चित्त कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए जब
उनको अमेरिका जाने के लिए वीजा
नहीं मिला तो उन्होंने वीडियो
कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी
बात लोगों तक पहुंचाई या
फिर टाटा को गुजरात में
अपनी फैक्ट्री लगाने के लिए मजबूर
करना पड़ा हो। बल्कि विरोधी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब
देने के लिए टीवी
पर लाइव इंटरव्यू देकर।
मोदी
की भूमिका में विवेक ओबरॉय लुक तो ठीक लगता
है लेकिन जितना परकाया प्रवेश की जरुरत थी
, उतना वह साध नहीं
पाये। अमित शाह के रोल में
मनोज जोशी जंचे तो हैं लेकिन
असल जिन्दगी में मोदी और शाह की
जोड़ी की जितनी मजबूत
पार्टनरशिप दिखाई देती है, वह यहां मिसिंग
है। या कह सकते
हैं कि निर्देशक ने
उतना स्पेस नहीं दिया जितना दिया जाना चाहिए। मां की भूमिका में जरीना
बहाब का काम बढ़िया
है। बोमन ईरानी थोड़ी देर के लिए ही
नजर आते हैं लेकिन उनकी उपस्थिति दर्शकों को याद रहती
है।
गीत—संगीत ठीक—ठाक है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है
कि मोदी को जानने के
लिए यह फिल्म देखी
जा सकती है और इसके
सीक्वल की उम्मीद भी
की जा सकती है।
-©Dr Sadhna Agrawal
Asst. Prof & Film Critic

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