प्यार का सुखद अहसास
फिल्म : दे दे प्यार दे
निर्देशक : आकिव अली
अभिनय : अजय देवगन, तब्बू, रकुल प्रीत, जिम्मी शेरगिल, जावेद जाफरी, आलोकनाथ
पटकथा और निर्माता : लव रंजन
संगीत : अमाल मलिक, रोचक कोहली
अवधि : 136 मिनट
रेटिंग : ⭐⭐⭐
यह फिल्म एक लव कॉमेडी और प्रेम त्रिकोण की है जिसमें बस प्यार हो जाता है। वैसे भी जब प्यार होता है तो न उसमें कोई उम्र आड़े आती है और न धर्म। यह प्रेम की ही ताकत है कि इसे पाने के लिए लोग बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने में भी नहीं हिचकते। प्रेम की अनुभूति ऐसी जादुई होती है कि हर कोई जीवन,जगत, जिम्मेदारियां, जवाब देहियों, जद्दोजहद के बावजूद इस अनुभति को अपने भीतर संजोय रखना चाहता है। प्रेम की शायद यही ताकत है और यही इसकी कमजोरी भी कि प्यार में गिरफ्त व्यक्ति किसी भी हद से गुजरने को तैयार रहता है।
लेकिन इस प्यार में केवल उम्र का गैप ही नहीं है बल्कि जैनरेशन गैप भी है फिर भी दोनों एक—दूसरे के साथ खुश है। 50 साल के अजय देवगन यानी आशीष को अपनी बेटी की उम्र की आयशा (रकुल प्रीत) से प्यार हो जाता है। यहां सवाल यह उठता है कि ऐसे प्यार को समाज स्वीकार करता है या नहीं। खासकर भारतीय समाज में तो इसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता। हालांकि अजय देवगन अपने प्यार को जस्टीफाई करने के लिए कुछ उदाहरण भी देते हैं लेकिन कहीं उनके मन में दुविधा भी है इसीलिए वह अपने मनोचिकित्सक दोस्त जावेद जाफरी के पास जाते भी है और वह उन्हें आयशा से दूर रहने की सलाह भी देता है। बल्कि नसीहत देता है कि लड़की तुम्हारे पैसों के कारण प्यार करने का दिखावा कर रही होगी। लेकिन अजय उसकी बात नहीं मानते और अपने दिल की सुनते हैं। समस्या तब खड़ी होती है जब आशीष आयशा को लंदन से भारत अपने परिवार से मिलाने जा पहुंचते हैं।
इस फिल्म के पटकथा लेखक और निर्माता लव रंजन इससे पहले प्यार का पंचनामा और सोनू के टीटू की स्वीटी से अपनी एक खास जगह दर्शकों में बना चुके हैं। हालांकि यह उस तरह की नहीं है लेकिन उसकी कुछ छाप जरुर दिखाई देती है। निर्देशक आकिव अली मुख्यत: एडीटर का काम करते हैं और बखूबी करते हैं लेकिन अपनी फिल्म को मोहवश एडिट करने से चूक जाते हैं।
और अनावश्यक रूप से यह फिल्म थोड़ी लंबी हो जाती है जिससे थोड़ी उबाउ होने लगती है।
अजय देवगन ने अपनी भूमिका को अच्छे ढंग से निभाया है। एक तरफ उनका प्यार है तो दूसरी तरफ बेटी की खुशियां। लेकिन पत्नी की भूमिका में तब्बू ने जो समझदारी दिखाई है, वह काबिलेतारीफ है और इसी कारण फिल्म का अंत शानदार। वह लोगों को अपने और अजय देवगन के रिश्ते को लेकर न केवल चुप कराती हैं बल्कि खुद रकुल और अजय देवगन के प्यार को गलत नहीं समझती और उन दोनों को मिलाती हैं। रकुल प्रीत बेहद आकर्षित करती हैं, उनकी मस्ती, चुलबुलापन, खिलदंड़ापन तो अच्छा लगता ही है, एक ताजगी भी चेहरे पर दिखाई देती है और उनमें एक महत्वपूर्ण अदाकारा होने की आश्वस्ति भी दिखाई देती है। हालांकि इससे पहले भी वह यारियां और अय्यारी फिल्म में काम कर चुकी हैं। मनोचिकित्सक बने जावेद जाफरी का रोल छोटा होने के बावजूद महत्वपूर्ण है। वहीं तब्बू के दोस्त के रूप में जिम्मी शेरगिल के हिस्से में कुछ खास नहीं आया है। आलोकनाथ ठीकठाक लगे हैं।
इसका गीत—संगीत साधारण है लेकिन दिल रोई जाए कहीं दिल को छूता है। कुल मिलाकर यह फिल्म कहीं न कहीं प्रेम का अहसास कराने में सफल होती है और स्पष्ट संकेत देती है कि किसी रिश्ते को जिन्दगीभर घसीटने से तो बेहतर है कि आप अलग हो जाओ और जिसमें खुशी मिलती हो वह करो बिना समाज की परवाह किए।
©Dr. Sadhna Agrawal
Film critic & Assist. prof (Delhi university)

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