लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु की गुत्थी सुलझाने की कोशिश
निर्देशक : विवेक अग्निहोत्री
अभिनय : श्वेता बसु प्रसाद, मिथुन चकवर्ती, नसीरुद्दीन शाह, मंदिरा वेदी, पल्लवी जोशी, पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक
अवधि : 144 मिनट
रेटिंग : ⭐⭐स्टार
देश में चुनावी माहौल है और हाल—फिलहाल रिलीज होने वाली एक फिल्म अधर में लटकी है कि इसी बीच विवेक अग्निहोत्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के रहस्य को सुलझाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन समझ नहीं आता कि फिल्म का शीर्षक रोमन लिपि में लिखकर वे क्या कहना चाहते हैं। शास्त्री जी की मृत्यु की गुत्थी 53 साल बीत जाने के बाद भी आज तक नहीं सुलझ पाई है और हम हवा में हस्ताक्षर करते नजर आते हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि इस रहस्य का जानने की कोशिश पहले नहीं की गई होगी लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इतने सालों के बाद भी यह रहस्य अभी तक बना हुआ है कि शास्त्री जी मृत्यु कैसे हुई?
युवा पत्रकार रागिनी फुले (श्वेता बसु प्रसाद) अपने पत्रकारिता के कैरियर को बनाये रखने के लिए एक स्कूप की खोज में देश के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाना चाहती हैं और उनकी खबर के प्रकाशित होने के बाद सरकार को एक समिति का गठन करना पड़ता है जिसमें रागिनी भी एक सदस्य हैं। राजनीति में कैसे—कैसे दांव—पेच चलने पड़ते हैं, इसकी ओर भी इशारा किया गया है।
यह फिल्म ताशकंद दौरे पर गए हमारे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की वहां आकस्मिक मौत के चारों ओर घूमती है।
इस फिल्म में कई पुस्तकों के उदाहरण देकर इसे विश्वसनीय बनाने की कोशिश की गई है। साथ ही समाज और तत्कालीन सरकार को कटघरे में खड़ा किया है कि हमारी सरकार ने शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम आखिर क्यों नहीं कराया? लेकिन बीच में यह फिल्म अपने लक्ष्य से भटकती समाजवाद और संविधान में उलझ जाती है।
एक बंद कमरे में समिति के तमाम सदस्य बहस करते हैं, अपने विचार प्रस्तुत करते हैं और एक—दूसरे पर कटाक्ष करते हैं। साथ ही यह स्पष्ट संकेत भी दिया जाता है कि हर कोई किसी न किसी के इशारे पर काम कर रहा है और राजनीति में कोई किसी का हितेषी नहीं। सब अपने—अपने हित साधने में लगे हैं। मिथुन चक्रवर्ती का काम बेहतरीन है लेकिन नसीरुद्दीन शाह का ठीक ढंग से उपयोग नहीं किया गया । पल्लवी जोशी, मंदिरा वेदी और पंकज त्रिपाठी का काम बढ़िया है। श्वेता बसु प्रसाद इस फिल्म की मुख्य कलाकार हैं और उन्होंने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया है।
यदि हम सोचें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि इस देश में जब एक प्रधानमंत्री की मृत्यु के रहस्य को नहीं जाना जा सकता तो फिर आम आदमी की तो बिसात ही क्या? लेकिन इतना जरुर कहना पड़ेगा कि इतने सालों बाद भी हम इस रहस्य को सुलझा नहीं पाये तो इसके लिए दोष किसको दिया जाए? या फिर जानबूझकर इस रहस्य को सुलझाया नहीं गया ? ऐसे तमाम सवाल हमारे मन में उमड़ने—घुमड़ने लगते हैं। यह एक राजनीतिक थ्रिलर फिल्म है, जिसका विषय तो बहुत अच्छा है लेकिन बिल्कुल साधारण बन कर रह जाती है।
©Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Prof, Delhi University

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