निर्देशक : अभिषेक वर्मन
अभिनय : संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, वरुण धवन, आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा, आदित्य रॉय कपूर, कुणाल खेमू
संगीत: अमिताभ भट्टाचार्य
गीत : प्रीतम
अवधि : 168 मिनट
रेटिंग : 2 स्टार
प्रिय रूप उर्फ आलिया भट्ट
बहुत भारी मन से तुम्हें यह खत लिखना पड़ रहा है। तुम इसी से अंदाज लगा सकती हो कि फिल्म को रिलीज हुए चार दिन बीत चुके हैं, कायदे में तो उसी दिन या अगले दिन लिख देना चाहिए था लेकिन मन नहीं हुआ। तुमसे यह अपेक्षा नहीं थी कि इतनी उंचाई पर पहुंचकर तुम अपने कैरियर को इस तरह पारे की तरह लुढ़काकर एकदम नीचे गिरा दोगी। तुम्हारी ऐसी क्या मजबूरी थी कि इस तरह की चलताउ फिल्म में काम करके अपनी प्रतिभा को इस तरह नष्ट करो ? क्या तुमने गौर नहीं किया कि तमाम बासी पड़ चुकी कहानियों को भव्य और दिव्य सेट पर सजाकर परोस देने से कुछ नहीं होता। वैसे भी वासी चीजें सेहत के लिए नुकसानदेय ही होती हैं। इस फिल्म का नाम ही कलंक नहीं है बल्कि तुम्हारे कैरियर के लिए भी यह कलंक साबित हो सकती है। धर्मा प्रोडक्शन की यह फिल्म देखने के बाद अब लोग भविष्य में अपनी मेहनत की कमाई यूं ही नहीं गवां सकते। अब दर्शक इतना बेवकूफ नहीं कि उसको कुछ भी परोस दिया जाए और वह हीरोइन की सुंदरता पर मर मिटे। अब उसके लिए कंटेंट और कहानी ज्यादा महत्वपूर्ण है। तुम पीछे मुड़कर देखो तो सही, अभी हाल ही में आई तुम्हारी फिल्म 'राजी' को लोगों ने भरपूर प्यार ही नहीं बल्कि साल की एक बेहतरीन फिल्म भी घोषित किया और तुम्हें अपने सिर—माथे पर बैठा लिया।
इस फिल्म में भारत—विभाजन के दंश को दिखाने का क्या औचित्य था, समझ नहीं आया। प्रेम त्रिकोण पर न जाने कितनी कहानियां और फिल्में आ चुकी हैं। सत्या उर्फ सोनाक्षी की महानता तो देखो कि मरने से पहले ही अपने पति देव चौधरी (आदित्य रॉय कपूर) की खुशी के लिए वह तुम्हें चुन तो लेती है और शादी भी करवा देती है। पति तुम्हारी इज्जत करने को तैयार है लेकिन प्यार करने को नहीं। यहां यह बात अखरती है कि एक तरफ कि तुम दोनों की बातचीत तो होती है लेकिन एक दूसरे का चेहरा नहीं देखते। और हद तब हो जाती है कि बड़े नाटकीय और बिदांस अंदाज में तुम अपने पति के दफ्तर पहुंचकर अपनी बेशकीमती राय दे देती हो और मजाक का पात्र बनती हो। तुम्हारे ससुर बलराज चौधरी (संजय दत्त) को अपनी गलती का अहसास तो है लेकिन विवाहेतर संबंधों से उत्पन्न बेटे जफर (वरुण धवन) को अपना नाम नहीं देना चाहते और बेटा बदले की आग में जल रहा होता है। वह अपनी मां बहार बेगम (माधुरी दीक्षित), जो एक तवायफ है और पिता, जो रसूखदार और इज्जतदार आदमी है, दोनों से ही नफरत करता है और इसी नफरत के चलते वह उसकी बहू यानी तुम्हें हासिल करके बदला लेना चाहता है और तुम उस पर मर मिटी हो।
इस फिल्म की बनावट को देखकर संजयलीला भंसाली की याद आती है तो तुम्हारे अभिनय में कहीं दीपिका पादुकोण की छाप। बेसिरपैर की इस फिल्म में सब कुछ इतना घालमेल कर दिया गया है कि दर्शक समझ ही नहीं पाता कि वह अपना सिर पीटे या फिर पर्दे के भीतर जाकर उसको बनाने वाले का या फिर उसमें काम करने वालों का। तुम केवल एक वजह बता दो इसको देखने की और समझ न आये तो ऐसी गलती दोहराने की सोचना भी मत नहीं तो यह फिल्म एक कलंक की तरह साबित होगी जिससे पूरी टीम उभर नहीं पायेगी। अंत में बस इतना ही कहूंगी कि ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि दे!
एक शुभेच्छु।
©Dr Sadhna Agrawal
Asst. Professor & Film Critic

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