निर्देशक
: ऐजाज़ खान
अभिनय : अरशद रेशी, रसिका दुग्गल, सुमित कौल, विकास कुमार
अवधि :
114 मिनट
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ स्टार
एक
ऐसे समय में ऐजाज़ खान इस फिल्म को
लेकर आए हैं जब
कश्मीर एक बार फिर
चर्चा में है। हालांकि इसमें कश्मीर की समस्याओं को
भी दिखाया गया है जिसमें एक
तरफ आजादी की मांग करते
कुछ लोग हैं तो कुछ दहशत
फैलाकर माहौल को खराब कर
रहे हैं और नौजवानों को
मजहब के नाम पर
बरगला रहे हैं तो दूसरी ओर
सीमा पर सुरक्षा के
लिए तैनात जवानों की दूभर होती
जिन्दगी। लेकिन इस कश्मीर समस्या
के केन्द्र में एक सात साल
का मासूम हामिद है जिसकी मासूमियत
को देखकर और उसके सवालों
को सुनकर लगता है कि काश
यह पूरी दुनिया इसी बचपन में तब्दील हो जाए जहां
न कोई भेद—भाव हो, न ईर्ष्या—द्वेष,
न कोई वैर, न लड़ाई—झगड़ा,
न कोई मज़हबी दीवारें।
अब धीरे—धीरे यह ट्रेंड बदल
रहा है कि फिल्म
हिट होन के लिए बड़े—बड़े कलाकारों को लेना पड़ेगा
या फिर ज्यादा ग्लैमर और अधिक बजट
वाली फिल्में ही सफल हो
सकती है। फिल्म की कहानी में
यदि दम हो तो
किसी बड़े नाम के सहारे की
जरुरत नहीं। क्योंकि आजकल बड़े लोगों के बरक्स बाल
अभिनेता भी पूरी फिल्म
को अकेले अपने दम पर कामयाबी
के शिखर को छू सकते
हैं। उदाहरण के लिए अभी
कुछ ही महीनों पहले
आई फिल्म पीहू को देखा जा
सकता है। इसी कड़ी में अब यह फिल्म
हामिद भी इसका उदाहरण
है।
दरअसल इस फिल्म में
हामिद (अरशद रेशी) के परिवार में
पिता रहमत (सुमित कौल) हैं जो कश्ती बनाकर
अपना जीवन—यापन करता है। मां इशरत (रसिका दुग्गल) है, जो सिलाई—कढ़ाई
का काम करके घर चलाने में
आर्थिक मदद करती है। एक रात अपने
बेटे के लिए सैल
लेने गया रहमत गायब हो जाता है।
इशरत आए—दिन पुलिस—स्टेशन के चक्कर काटती
है लेकिन कुछ हासिल नहीं होता। अकेला रह गया हामिद
अपनी बाल बुद्धि से अपने
अब्बू की तलाश में
जुट जाता है।
हामिद के रोल में
अरशद रेशी अपनी मासूमियत से दर्शकों का
दिल जीतने में सफल रहे हैं। वहीं इशरत
की भूमिका में रसिका दुग्गल बेहद विश्वसनीय और प्रभावशाली लगी
हैं। रसिका दुग्गल की बेहतरीन अदाकारी अभी
उनकी पिछली फिल्म मंटो में भी दिखाई पड़ी थी। हामिद के
अब्बू सुमित कौल का रोल बेहद
छोटा होने पर भी शानदार
है। सेना के जवान की
भूमिका को विकास कुमार
ने प्रभावशाली तरीके से निभाया है।
इसका कसा हुआ निर्देशन दर्शकों को पूरी तरह
बांधने में सफल होता है जिसके कई
संवाद दिल को न केवल
छूते हैं बल्कि फिल्म खत्म होने के बाद भी
लगातार हमारे दिमाग में गूंजते रहते हैं।
बिना किसी राजनैतिक पचड़े में पड़े आप इस फिल्म
को देखकर जब और अधिक
संवेदनशील होकर बाहर निकलते हैं तो आपकी आंखों
में नमी होती है। इसका अंत इससे खूबसूरत नहीं हो सकता था
क्योंकि इसमें अपनी मां के साथ कश्ती
में सवार बच्चे की आंखों में
उम्मीद की रोशनी जो
है।
-Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Professor, Delhi University

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