अपना—अपना
लोकतंत्र
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फिल्म : ठाकरे
निर्देशक
: अभिजीत पानसे
अभिनय : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अमृता राव संगीत : रोहन
गीत : सुनील जोगी, मनोज यादव
अवधि : 139 मिनट
रेटिंग : 2.5 स्टार
हेमिंग्वे के जीवनीकार चार्ल्स ने स्वीकारा है कि
’’
कोई भी जीवनी व्यक्ति को उसी रूप में चित्रित नहीं कर सकती जिस रूप में वह होता है”A जीवनीकार अपनी कल्पना और जीवन की समझ के आधार पर कभी विवरणों कभी निहित के माध्यम से अपने नायक के झूठ को बहिष्कृत और सच को स्थापित करने का प्रयास भर ही कर पाता है। निसंगता या तटस्थता के गुणों से मंडित जीवनी भी अपने नायक के अंतर्जगत में प्रवेश नहीं कर पाती। अपने विषय के वाह्य जगत पर उसका अपूर्व अधिकार हो सकता है लेकिन उसके भाव जगत पर नहीं। यों कभी—कभी एक खास शैली या कलात्मक चातुर्य का प्रयोग करते हुए जीवनीकार अपने नायक के अंतर्जगत में प्रवेश करने को प्रमाणित करने का प्रयास करता है। किंतु इस तरह जीवनीकार अपने शिल्प की सीमाओं को ही तोड़ने का दु%साहस करता है। जीवनीकार अपने नायक के अंतर्जगत की कुछ भावनाओं पर अपनी पकड़ स्थापित कर सकता है पर पूरा दृश्य जगत जिसे रूसो ने
’
भावनाओं का दायाधिकार’
कहा है, वह जीवनीकार की सामर्थ्य के बाहर है। इन भावनाओं की श्रृंखला के लिए एकमात्र प्रामाणिक व्यक्ति वह व्यक्ति या आत्मकथाकार स्वयं है। बकौल ‘गिबन’ मेरे अपने विचारों और कार्यों की वर्णना के लिए कोई भी व्यक्ति उतना योग्य नहीं जितना कि मैं स्वयं।’ दरअसल जीवन का एक बिंदु ऐसा होता है जहां ऐसे सवाल (बकौल गालिब उठते हैं—
सुखन में खाम ए गालिब की आतिश अफशानी
यकीं है हमको भी लेकिन अब उसके दम क्या है।
जब हम कोई बायोपिक फिल्म देखते हैं तो दूसरी फिल्मों की अपेक्षा ऐसी फिल्में हमें कभी हौंसला देती हैं और कभी प्रेरणा। यूं तो काफी पहले से बायोपिक फिल्में बनती रही हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बायोपिक फिल्मों का क्रेज कुछ ज्यादा ब
ढ़ा है।
इस
साल के शुरूआत में ही दो फिल्में आई हैं—मणिकर्णिका और ठाकरे।
निर्देशक अभिजीत पानसे और लेखक संजय राउत की फिल्म ठाकरे महाराष्ट्र के शिवसेना प्रमुख बालासाहब के जीवन पर बनी ऐसी फिल्म है जिसमें बाला साहब की जिन्दगी के उन पन्नों को खोला गया है जिसमें उनकी गलतियों को भी बखूबी जस्टीफाई करते उन्हें महानायक ही नहीं भगवान तक का दर्जा दे दिया गया है।
दरअसल बाला साहब मूलत: कलाकार थे जो अपने कार्टूनों के माध्यम से अपना विरोध जताते थे। लेकिन जब उनके कार्टून अखबार में छपने बंद हो गए तो उन्होंने मार्मिक नाम से खुद का एक साप्ताहिक अखबार निकाला जो मराठी मानुस को अपना हक दिलाने की लड़ाई लड़कर लोगों को जागरुक कर रहा था। और इस काम में हिंसक होना भी कोई बुरी बात नहीं समझी जाती थी। कह सकते हैं कि बाला साहब ने अपना हक पाने के लिए कोई भी रास्ता चुनने पर जोर दिया क्योंकि उनका कहना था कि समूचे महाराष्ट्र में मराठियों का हक छीन कर गैर मराठियों का आधिपत्य बढ़ता जा रहा है। मराठियों को कहीं नौकरी नहीं मिल रही। उन्हें अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए न केवल अखबार निकालना पड़ा बल्कि सक्रिय राजनीति में भी उतरना पड़ा। इसके लिए उन्होंने शिवसेना की नींव रखी। उन्होंने न केवल हिंदूत्व पर जोर दिया बल्कि हाथ में लाठी और तलवार उठाने से भी कोई गुरेज नहीं किया। धीरे—धीरे उनकी ताकत बढ़ती गई जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बल्कि इंदिरा गांधी के आपातकाल को उन्होंने अपना समर्थन दिया।
बालासाहब की भूमिका को नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बखूबी निभाया है। वही जोश और क्रांति का भाव उन्होंने कहीं छूटने नहीं दिया है जो बालासाहब की पहचान थी। लेकिन इस फिल्म को गढ़ते समय उनकी कमजोरियों को उजागर करना चाहिए था जो कि जस्टीफाई किया गया है, जो सही नहीं लगता। यदि आप कोई बायोपिक फिल्म बनाते हैं तो उसकी तमाम खूबियों के साथ उसकी कमजोरियों पर उंगली रखने की आपकी जिम्मेदारी बनती है जो कि इस फिल्म में नहीं हो सका। यही इस फिल्म की कमी या एक सीमा कही जा सकती है। क्योंकि खून—खराबा, हत्या जैसे कामों को भी अगर सही साबित करे और लोकतंत्र को न मानने की खोखली दलीलें दे तो इसे कोई भी सराहनीय नहीं कहेगा। अगर हर व्यक्ति कानून अपने हाथ में लेता घूमे तो सोचिए इस देश का हाल क्या होगा। बालासाहब की पत्नी की भूमिका में अमृता राव के पास कहने को न ज्यादा कुछ था और न करने को लेकिन जितना था, वह अच्छा लगता है।
Film Critic, Delhi, India

Well written
ReplyDeleteJai Maharashtra ��
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