खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
फिल्म
: मणिकर्णिका : द्
क्वीन आफ झांसी
निर्देशक : कृष और कंगना रनौत
अभिनय
: कंगना रनौत, अतुल कुलकर्णी, जीशु सेनगुप्ता, सुरेश ओवराय, डैनी, अंकिता लोखंडे, मोहम्मद जीशान, कुलभूषण खरबंदा
गीत
: प्रसून जोशी
अवधि
: 148 मिनट
रेटिंग
: 2.5 स्टार
इस सप्ताह फिल्म ठाकरे के साथ ही एक और बायोपिक फिल्म आई मणिकर्णिका जिसमें
कंगना रनौत न केवल मुख्य भूमिका में हैं बल्कि उन्होंने पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रखा है। दरअसल यह फिल्म झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित है। इतिहास साक्षी है कि लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी राज्य की ऐसी बहादुर रानी थीं जिन्होंने न केवल अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए बल्कि रणभूमि में औरतों को उतार कर एक नया इतिहास रच दिया। लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था, जिन्हें परिवारवाले प्यार से मनु पुकारते थे। शास्त्रों की शिक्षा के साथ—साथ मनु को शस्त्रों की शिक्षा भी दी गई। उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ। गंगाधर राव ने उन्हें लक्ष्मीबाई नाम दिया। उनका पुत्र हुआ लेकिन दुर्भाग्य से पुत्र की मृत्यु हो गई और गंगाधर राव भी लक्ष्मीबाई को अकेला छोड़ स्वर्गवासी हो गए। अंग्रेजों की निगाह झांसी पर थी। हमारे पहले स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों से सामना करने वाली वह ऐसी वीरांगना थीं जिन्होंने कभी हार नहीं मानी। जबकि अंग्रेजों की सेना के मुकाबले उनके पास न केवल सेना की संख्या बहुत कम थी बल्कि हथियार भी बहुत सीमित संख्या में थे। लक्ष्मीबाई ने न केवल पुरुषों को बल्कि महिलाओं से भी साथ देने की अपील की जिसको खुले मन से लोगों ने स्वीकार किया। यह बात अलग है कि उनमें कुछ ऐसे अपने गद्दार भी थे जो राह में अड़चन ड़ाल रहे थे। रानी लक्ष्मीबाई ने सीमित संसाधनो के रहते न कभी हिम्मत हारी और न अपनी झांसी को छोड़ा। वह कहती थीं —मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। लेकिन ऐसा कब तक चलता और लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से मुकाबला करती वीरगति को प्राप्त हुईं।
इस फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका में कंगना रनौत ने सराहनीय काम किया है। उनके चेहरे पर भावभंगिमा से लेकर जो स्वाभिमान दिखाई देता है, अच्छा लगता है। अंकिता लोखंडे ने झलकारीबाई के किरदार को बखूबी निभाया है। उनसे अपेक्षा है कि वह आगे और अच्छी भूमिकाएं करेंगी। बाकी कलाकारों को जितना स्पेस मिला है, उनका काम भी बढ़िया है। भव्यता के साथ फिल्माए दृश्य आकर्षित करते हैं। इस फिल्म को देखते बरबस
हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की ये पंक्तियां हमारे मन में गूंजने लगती हैं— 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी'। और हम देश प्रेम में लबालब। लोग इस फिल्म में भी कमियां गिना सकते हैं लेकिन ऐसी वीरांगना को पर्दे पर उतारने के लिए हमारा सिर गर्व से जरुर झुक जाता है।

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