दर्शकों
को चीट करती फिल्म
फिल्म : व्हाय चीट इंडिया
निर्देशक : सौमिक सेन
अभिनय : इमरान हाशमी, श्रेया धनवंतरी, स्निघदीप चटर्जी
अवधि : 120 मिनट
रेटिंग :
1. 5 स्टार
हमारी
शिक्षा प्रणाली में कितना भ्रष्टाचार फैला हुआ है, या इसका व्यावसायिकरण
हो चुका है या फिर
इसमें एक पूरा माफिया
जगत घुस गया है जैसे विषय
पर फिल्म बनाना कोई नया विषय नहीं है। यदि हम थोड़ा पीछे
मुड़कर देखते हैं तो हमें मुन्ना
भाई एमबीबीएस फिल्म याद आ जाती है।
दरअसल माता—पिता की महत्वाकांक्षा और
अपने बच्चों पर अपनी चाहत
थोपना इसका एक बड़ा कारण
दिखाई देता है। इस फिल्म में
यही सारी बातें दिखाई गई हैं जिनमें
कुछ भी नया नहीं
है।
हर
पिता की तरह इस
फिल्म में भी मध्यवर्गीय सत्तू
स्निघदीप चटर्जी के पिता का
एक ही सपना है
कि किसी भी तरह उसका
बेटा इंजीनियर बन जाए। बेटा
लायक भी है और
वह इंट्रेंस परीक्षा पास भी कर लेता
है। लेकिन दुर्भाग्य से सत्तू को
राकेश सिंह उर्फ रॉकी इमरान हाशमी मिल जाता है जो गरीब
मेधावी बच्चों की मदद से
अमीर बच्चों के बदले पेपर
दिलवाता है और उनका
एडमिशन करवाता है जिसकी एवज
में कुछ पैसे उन्हें देता है। बाद में राकेश और आगे बढ़कर
एमबीए में भी यही फार्मूला
अपनाता है बल्कि पेपर
लीक भी करता है।
मेधावी सत्तू को ड्रग्स की
लत लग जाती है
और वह आत्महत्या करने
को मजबूर हो जाता है।
एक
अच्छी कहानी पर बहुत ही
साधारण किस्म की यह फिल्म
बनी है क्योंकि यह
दर्शकों को कहीं से
भी न तो बांध
पाती है और न
ही जोड़ने में कामयाब हो पाती है।
इसको इतना उलझा दिया गया है कि दर्शक
आपस में इसकी कड़ियां जोड़ना भी चाहे तो
दिमाग चकरा जाए। कमजोर पटकथा और लचर निर्देशन
के चलते अंत तक आते—आते
पूरी फिल्म बिखर जाती है और दर्शक
खुद को ठगा देखता
रह जाता है। फिल्म की गति इतनी
धीमी है कि कभी—कभी मन करता है
कि इसे खुद ही आगे बढ़ाने
का मौका मिल जाता तो अच्छा होता।
न कहीं कोई सस्पेंस, न रोमांच। एक
मंथर गति से आराम से
फिल्म बमुश्किल आगे बढ़ती है। एक पल भी
ऐसा नहीं लगता कि आगे क्या
होगा ? कोई इमोशन दिखाई नहीं देता।
अगर
हम अभिनय की बात करें
तो इमरान हाशमी का इसमें निगेटिव
किरदार है जिसके लिए
वह जाने जाते हैं। सत्तू की बहन बनी
श्रेया धनवंतरी ने अच्छा काम
किया है। वहीं स्निघदीप चटर्जी की मासूमियत लुभाती
है। उम्मीद की जा सकती
है कि वह भविष्य
में अच्छा काम कर सकेंगे।
इस
फिल्म में इतने सारे गाने होने के बावजूद कोई
भी गाना न तो याद
रह पाता है और न
ही दिल को छू पाता
है। कुल मिलाकर यह फिल्म दर्शकों
को चीट करती लगती है जिनका पैसा
और समय दोनों ही बर्बाद होते
हैं।

Emran hashmi ko acting nahi aati hai
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