2.0 Film Review: It is not only for Rajni Fans but for Everyone!


                   मोबाइल फोन :   खतरे की घंटी



फिल्म : 2. 0
निर्देशक: एस. शंकर
अभिनय: रजनीकांत, अक्षय कुमार, एमी जैक्सन, आदिल हुसैन
संगीत : आर रहमान
अवधि : 150 मिनट
रेटिंग : 3 स्टार               

                                          


 2010 में आई फिल्म 'रोबोट' का सीक्वल है यह फिल्म। आज इस कदर हम गैजेट्स के आदी हो चुके हैं लगता है कि इसके बिना मानो सांसे ही थम जाएगीं, यह जानते हुए भी इनसे निकलने वाली रेडिएशन सिर्फ आंखों को बुरी तरह नुकासान पहुंचा रही है बल्कि यह रेडिएशन कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों की आशंका भी बढ़ाती है फिर भी हर उम्र का व्यक्ति इसके बिना एक पल भी रह नहीं सकता। इसी खतरे का आगाज करती है यह फिल्म जो साइंस फिक्शन पर आधारित है। इसमें 3डी और वीएफएक्स का प्रभाव इसके वजट को बहुत ज्यादा बढ़ाता है। अगर थोड़ी मेहनत शंकर इसकी कहानी पर कर लेते तो यह अधिक सफल हो सकती थी। इसका उद्देश्य तो बेहतरीन है लेकिन बिना कहानी के यह हास्यास्पद ही ज्यादा हो जाती है।

                दक्षिण भारत के एक शहर से अचानक लोगों के हाथों से मोबाइल फोन हवा में उड़कर गायब होने लगते हैं जिसे लेकर भारी अफरातफरी मच जाती है। समस्या का समाधान ढ़ूढने के लिए डा0 वशीकरन (रजनीकांत) को बुलाया जाता है। यह वही वशीकरन हैं जिन्होंने  एक खास रोबोट (चिट्टी) को बनाया था लेकिन मानव विरोधी होने के कारण उसको बंदकर रखा है। डा0 वशीकरन को पता लगता है कि मोबाइल गायब होने में पक्षीराजन (अक्षय कुमार) का हाथ है। पक्षीराजन पक्षियों की मौत का जिम्मेदार मोबाइल फोन को मानता है क्योंकि इससे निकलने वाली रेडिएशन के कारण पक्षी मर रहे थे। चूंकि पक्षी ही इस धरती पर फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को खाते हैं और जब पक्षी ही नहीं बचेंगे तो मनुष्य का जिंदा रह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा। लेकिन पक्षीराजन की बात कोई नहीं सुनता और मजबूरी में उसे आत्महत्या करनी पड़ी थी। अब उसके अंदर बुरी आत्मा गई है जो मोबाइल प्रयोग करने वालों को मार देती है। पक्षीराजन का अपना तर्क है और डा0 वशीकरन का अपना तर्क। दोनों के बीच लड़ाई शुरू हो जाती है।

              चूंकि यह फिल्म रजनीकांत की है और निर्देशक को उन्हें ही सुपर हीरो बनाना है चाहे वह गलत ही क्यों हों इसीलिए मानवता को बचाने वाले पक्षीराजन को विलेन बना दिया है लेकिन इसका अंत उन्होंने जिस तरह किया है वह बहुत अटपटा लगता है और फिल्म उनके हाथ से निकलती चली जाती है। वैसे अभिनय की दृष्टि से देखा जाए तो रजनीकांत से बेहतर अक्षयकुमार लगे है क्योंकि उनका गेटअप वीभत्स होते हुए भी दर्शकों को बांधे रखता है। रजनीकांत इसमें दोहरी भूमिका में हैं। रोबोट बनी (नीला) एमी जैक्सन अच्छी लगी हैं। मंत्री की भूमिका में आदिल हुसैन का काम ठीकठाक है। लेकिन आर रहमान का संगीत कोई जादू नहीं चलाता।
तकनीकी दृष्टि से अगर बात करनी हो तो यह फिल्म शानदार कही जाएगी लेकिन क्या केवल तकनीक ही सब कुछ है। लेकिन आपके और हमारे सोचने से क्या होगा ? वैसे भी आजकल अधिकांश फिल्मों में अगर आप कुछ सोचने की कोशिश करेंगे तो अपना ही समय बर्बाद करेंगे। हो सकता है कि रजनीकांत, जिन्हें दक्षिण में हीरो कम भगवान ज्यादा माना जाता है,के फैन को कहानी से कोई मतलब नहीं लेकिन यह निर्देशक की जिम्मेदारी होती है कि वह दूसरी चीजों में जहां इतनी मेहनत और पैसा लगा रहा है तो कहानी पर भी मेहनत करे। हालांकि उद्देश्य अच्छा था लेकिन इसको साधने में जो दृष्टि चाहिए थी वह दिखाई नहीं देती। 
               
-Dr. Sadhna Agrawal
Film Critic and Asst Prof (Delhi University)
Email- agrawalsadhna2000@gmail.com

Comments