हेलीकॉप्टर ईला की सफल उड़ान
फिल्म : हेलीकॉप्टर ईला
निर्देशक : प्रदीप सरकार
अभिनय : काजोल, ऋद्धि सेन, नेहा धूपिया, तोता रॉय चौधुरी
संगीत : अमित त्रिवेदी
गीत : स्वानंद किरकिरे
अवधि : 129 मिनट
रेटिंग : 3. 5 स्टार
यह फिल्म आनंद गांधी के गुजराती नाटक 'बेटा कागडो' पर आधारित है जो एक सिंगल मदर के संघर्ष, दिक्कतें, परेशानियां, चिंता, प्यार, जिम्मेदारी आदि को सामने लाती है। निर्देशक प्रदीप सरकार के साधारण निर्देशन और कमजोर पटकथा के चलते भी काजोल की दमदार परफार्मेंस दर्शकों को बांधे रखती है।
काजोल यानी ईला रायतुरकर अपने बेटे विवान (ऋद्धि सेन) को लेकर हर वक्त इस चिंता में डूबी रहती है कि कहीं उसके बेटे को कोई तकलीफ न हो। चूंकि वह सिंगल मदर है इसलिए उसको अपना कैरियर, अपनी इच्छाएं सब कुछ छोड़ना पड़ता है क्योंकि वह बेटे की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन उसकी अत्यधिक सजगता और प्यार बेटे को उलझन में ही नहीं डाल देता बल्कि विवान को घुटन भी महससूस होने लगती है। एक तरफ ईला को शिकायत है कि आज की पीढ़ी मोबाइल फोन में इस कदर मग्न है कि उनके पास किसी के लिए समय नहीं, दूसरी ओर विवान को अपनी जिन्दगी में थोड़ा स्पेस चाहिए। शादी से पहले ईला को न केवल मॉडलिंग का शौक था बल्कि वह गायिका भी बनना चाहती थी। पति अरुण (तोता रॉय चौधुरी) एक मिथ के चक्कर में कहीं चला जाता है क्योंकि उसके मन में यह डर था कि उसके परिवार में सभी पुरुषों की उम्र बहुत कम होती है। अरुण के जाने के बाद ईला अकेली पड़ जाती है इसीलिए वह अपना पूरा समय बेटे को देना चाहती है और अपनी तमाम इच्छाओं को अलमारी में बंद करके भूल जाती है। विवान हर वक्त अपनी मां की निगरानी से छुटकारा पाना चाहता है और सलाह देता है कि वह अपनी अधूरी पढ़ाई का पूरा क्यों नहीं कर लेतीं। ईला को यह सुझाव बहुत पसंद आता है और वह विवान के ही कॉलेज में एडमिशन ले लेती है ताकि अब कुछ घंटों के लिए भी विवान उसकी आंखों से ओझल न होने पाए। विवान को अपना सुझाव ही उल्टा पड़ जाता है। कॉलेज की थियेटर सोसाइटी को विवान इसलिए छोड़ देता है क्योंकि उसकी टीचर (नेहा धूपिया) ने उसमें ईला को गाने के लिए शामिल कर लिया है। अंतत: एक प्रतियोगिता में गाना गाती है जिससे सब ईला की काबलियत के मुरीद हो जाते हैं।
काजोल
एक बेहतरीन अदाकारा हैं जो उन्होंने इस फिल्म में भी साबित कर दिया है। अपने बेटे की चिंता करना, उसका डिब्बा तैयार करना, उसकी जासूसी करना, उसके दोस्तों की जानकारी रखना, अपने बनते हुए कैरियर को छोड़ देना, अपनी हर खुशी को बेटे की खुशियों में ढूंढना और बेटे की हर छोटी से छोटी जरुरतों को पूरा करना ही जैसे एक मां की जिन्दगी का हिस्सा हो जाता है, सब कुछ वैसा ही बिना किसी परेशानी के ईला में दिखाई पड़ता है। बीच—बीच में वह हंसाती भी हैं और कभी आंखे नम भी करती हैं। ऋद्धि सेन विवान की भूमिका में बहुत अच्छे लगे हैं और लगता ही नहीं कि यह उनकी पहली फिल्म होगी। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, ईला अरुण, शान, बाबा सहगल आदि की कैमियो भूमिका है।
इसका गीत—संगीत फिल्म को गति ही नहीं देता बल्कि बाहर आने पर भी हमें कुछ गाने गुनगुनाने का मन करता है जिनमें मुख्य हैं— यादों की अलमारी, मम्मा की परछाई। बाकी गाने —डूबा—डूबा मन तेरे प्यार में, चंद लम्हे बस खुशी के, खोया उजाला भी बहुत अच्छे लगे हैं। एक पुराना रिमिक्स गाना—रुक रुक रुक अरे बाबा रुक भी फिट बैठता है। हालांकि इसकी लंबाई कहीं—कहीं अखरने लगती है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह फिल्म पूरी तरह काजोल की है जिसमें एक मां और बेटे के रिश्तों के ताने—वाने को बहुत बारीकी से सभांलने की उन्होंने बखूबी कोशिश की है।
Dr Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst. Professor, Delhi university
Email- agrawalsadhna2000@gmail.com

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