नो मैंस लैंड : मंटो
निर्देशक : नंदिता दास
अभिनय : नवाजुद्दीन सिद्दिकी , रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन, इला अरुण, ऋषि कपूर, जावेद अख्तर, परेश रावल, रणवीर शौरी, राजश्री देशपांडे, दिव्या दत्ता
संगीत : स्नेहा खानवलकर
अवधि : 116 मिनट
रेटिंग : 3 स्टार
यह फिल्म उर्दू के सुप्रसिद्ध अफसानानिगार मंटो के जीवन पर केन्द्रित है। मंटो जितना पाकिस्तान के लेखक थे उससे कहीं ज्यादा वह हिंदुस्तान से प्यार करते थे और करें भी क्यों नहीं क्योंकि जिसकी जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा हिंदुस्तान में बीता था । उनके माता—पिता इसी धरती पर ही तो दफनाए गए थे और तो और उनकी पहली संतान यानी बेटे की असमय मौत भी इसी धरती पर हुई थी।
दरअसल सआदत हसन मंटो न केवल कहानियां लिखते
थे बल्कि आजादी से पहले बंबई में रहकर फिल्मों के लिए भी लेखन करते थे। उस दौर के उनके
समकालीन और दोस्त थे— अशोक कुमार, कृष्ण चंदर,
नौशाद, जद्दनबाई, इस्मत चुगताई आदि। उनके सबसे करीबी दोस्त थे मशहूर एक्टर श्याम चड्डा।
जिस दिन हमारा देश आजाद हुआ, उस रात आम हिंदुस्तानी की तरह मंटो भी बेहद खुश थे। लेकिन
भारत विभाजन की दुखद त्रासदी ने केवल देश का ही बंटवारा नहीं किया, लोगों का भी बंटवारा
कर दिया। मंटो पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे लेकिन अपने अजीज दोस्त श्याम की बात उन्हें
ऐसी चुभी कि उन्होंने उसी पल हिंदुस्तान छोड़ लाहौर (पाकिस्तान) जाने का निर्णय कर
लिया। लेकिन वहां के हालात और परिथितियों ने उन्हें विचलित कर दिया। वे तरक्की पंसद
लेखक थे। वे जैसा समाज में देखते थे, वही सच अपनी कहानियों में चित्रित करते थे। उनकी
कहानियों पर अश्लीलता के आरोप लगे और मुकदमा भी चला। जिस कारण मंटो टूटते चले गए और
शराब की लत ने उन्हें मौत के मुंह में ढकेल दिया। उनकी कहानी ठंडा गोश्त पर जब लाहौर
की अदालत में अश्लीलता का आरोप लगा और मुकदमा चला जिसमें उनके पक्ष में कोई खड़ा होने
को तैयार नहीं हुआ तो वे बेहद आहत हुए। प्रकाशक और संपादक उनकी रचनाओं की सम्मानजनक
कीमत उन्हें नहीं देते थे जिस कारण आर्थिक दिक्कतें उनके सामने हमेशा खड़ी रहती थी।
एक स्वाभिमानी लेखक सब कुछ सह सकता है लेकिन अपना स्वाभिमान नहीं खो सकता। स्थिति इतनी
दयनीय हो गई थी कि उनके पास जुर्माने के भरने के पैसे भी नहीं थे।अंत में वे शराब छोड़ने
के लिए रिहैब सेंटर जाने के लिए भी तैयार हो जाते है। इन सब के बावजूद एक अच्छी बात
यह थी कि उनकी पत्नी सफिया ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा और हर मुश्किल में वे उनके साथ
खड़ी थीं जो सभवत: मंटो की सबसे बड़ी ताकत थीं।
मंटो की इस बॉयोपिक फिल्म बनाने का हौंसला यदि निर्देशक नंदिता दास ने किया था तो उनके जीवन—संघर्ष पर ज्यादा फोकस करना चाहिए था और बीच—बीच में मंटो की कालजयी कहानियों को लघुकथा में ढालने के लालच से बचना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जिस कारण यह फिल्म एक बेहतरीन फिल्म बनने की जगह औसत फिल्म बनकर रह जाती है।
इस फिल्म की जो सबसे खास और अच्छी बात है वह है इसकी स्टार कास्ट। नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने खुद को मंटो के किरदार में हूबहू ढाल लिया है। लगता ही नहीं कि हम मंटो को नहीं उनके किरदार को देख रहे हैं। उन्होंने बेहतरीन काम किया है और दूसरे उनकी पत्नी सफिया की भूमिका को रसिका दुग्गल ने भी शानदार तरीके से निभाया है क्योंकि कमजोर पटकथा के चलते नवाजुद्दीन ने इस फिल्म को न सिर्फ संभाला है बल्कि जिया है। फिल्म एक्टर श्याम चड्डा के रोल में ताहिर राज भसीन, जद्दनबाई के रोल में इला अरुण, इस्मत चुगताई की भूमिका को राजश्री देशपांडे, प्रिंसिपल आबिदअली के रोल में जावेद अख्तर, फिल्म निर्माता बने ऋषि कपूर आदि का काम भी अच्छा है। इसी तरह मंटो की कहानी ठंडा गोश्त के नायक ईशर सिंह बने रणवीर शौरी और नायिका कुलवंत कौर बनी दिव्या दत्ता का अभिनय भी जीवंत है।
फैज अहमद फैज की गजल— बोल कि लव आजाद हैं और अब क्या बताउं से फिल्म को
एक गति मिलती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मंटो एक ऐसे लेखक थे जिनके बारे में बहुत कुछ छप चुका है। लेकिन निर्देशक नंदिता दास इस फिल्म में मंटो की कालजयी कहानियों के मर्म तक नहीं पहुंच पातीं इसलिए उन्हें क्षेपक के तौर पर नहीं बल्कि उनकी जिन्दगी पर फोकस करना चाहिए था।
—साधना अग्रवाल
Film Critic & Asst. Professor, Delhi university
Email- agrawalsadhna2000@gmail.com

Nice.
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