एक लड़की की मनमर्जियां
फिल्म: मनमर्जियां
निर्देशक : अनुराग कश्यप
अभिनय : अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू, विकी कौशल
संगीत : अमित त्रिवेदी
गीत:
शैली
अवधि : 157 मिनट
रेटिंग : 3 स्टार
ब्लैक फ्राईडे, गैंग्स आॅफ वासेपुर जैसी फिल्में बनाने वाले अनुराग कश्यप पहले भी देव डी में प्रेम त्रिकोण को दिखा चुके हैं लेकिन इस बार उनकी इस फिल्म में प्रेम त्रिकोण के साथ एक अति आधुनिक लड़की की मनमर्जियों दिखाई पड़ती हैं। वैसे तो प्रेम त्रिकोण पर न केवल ढेरों फिल्में बन चुकी हैं बल्कि हिंदी कथा साहित्य में भी अनेक कहानियां पढ़ने को मिलती हैं। इस नजरिए से तो इस फिल्म की थीम कोई नई नहीं है लेकिन इसमें जो नयापन है वह है एक अल्हण लड़की की सोच।
रूमी (तापसी पन्नू) के माता—पिता नहीं है, वह चाचा—चाची और दारजी के साथ अमृतसर में रहती है जो हॉकी की खिलाड़ी है और अपना एक स्टोर चलाती है। वह एकदम बिदांस लड़की है जिसे शादी से पहले अपने बॉयफ्रेंड विक्की संधू (विकी कौशल) के साथ सेक्स करने से भी कोई परहेज नहीं है।
दोनों घर से भागते हैं लेकिन गैरजिम्मेदार विक्की के कारण रूमी को वापस घर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ता है। घर वाले उसकी शादी कराना चाहते हैं। रूमी विक्की से शादी की बात करने के लिए घर आने के लिए कहती है लेकिन विक्की अभी इस जिम्मेदारी को नहीं उठाना चाहता। हताश और निराश होकर घरवाले रूमी की शादी लंदन से लौटे रॉबी भाटिया (अभिषेक बच्चन) से करवा देते हैं क्योंकि रॉबी रूमी की फोटो देखकर ही उससे प्यार करने लगता है। रॉबी रूमी की सभी इच्छाओं को पूरी करने की कोशिश ही नहीं करता बल्कि वह विक्की के बारे में भी जानता है। रूमी अपने पहले प्यार को भुला नहीं पाती और लगातार उसके संपर्क में रहती है। दूसरी तरफ वह रॉबी की बहुत इज्जत करती है और उसको भी छोड़ना नहीं चाहती।
तापसी पन्नू इस फिल्म में बिल्कुल एक नए अवतार में हैं। वह अपनी मर्जी से जिन्दगी जीने वाली आधुनिक लड़की है। उन्हें किसी भी बात के लिए न तो कोई संकोच है और न हिचक। इस भूमिका में वह बेहद आकर्षक लगी हैं। उनके हाव—भाव, बोलने का ढंग, चलने—फिरने की अदा, खुलकर शराब पीने से लेकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति तक में उनकी ये मनमर्जियां दर्शकों को लुभाती हैं। विकी कौशल जो एक डीजे की भूमिका में हैं, का काम भी बढ़िया है। विकी एक लापरवाह और गैरजिम्मेदार युवा है जो रूमी से प्यार करता है। अभिषेक बच्चन काफी लंबे समय के बाद पर्दे पर दिखाई दिए है। वह एक जिम्मेदार और धीर—गंभीर
मैच्योर इंसान के रूप में अच्छे लगे हैं।
इस फिल्म में पंजाबी की सुपरिचित लेखिका अमृता प्रीतम की एक कविता— मैं तेनू फिर मिलांगी को अमित त्रिवेदी ने अपने संगीत से खूबसूरती से ढाला ही नहीं है बल्कि फिल्म को समर्पित भी किया गया है, जो अच्छी बात है। बाकी और कई गाने भी अच्छे लगते हैं।
यह फिल्म एक अति आधुनिक लड़की की सोच,तौर—तरीका, इच्छा—अनिच्छा, संबधों में खुलापन
आदि बातों को उठाती है और यह जताती है कि एक लड़की भी अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी जीने का उतना ही हक रखती है जितना एक लड़का। उसके लिए सेक्स कोई टैबू नहीं है।
साधना अग्रवाल
Assistant Professor & Film Critic
Delhi University
Email: agrawalsadhna2000@gmail.com

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