Batti Gul Meter Chaalu: Film Review


भाषा के खिलवाड़ में मकसद गुल
   
फिल्म:  बत्ती गुल मीटर चालू
निर्देशक:  श्री नारायण सिंह 
अभिनय : शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम, सुष्मिता मुखर्जी, फरीदा जलाल, अतुल श्रीवास्तव 
संगीत : अनु मलिक, सचेत टंडन, रोचक कोहली 
गीत : सिद्धार्थ- गरिमा, नुसरत फतेह अली खान, मनोज मुंतशिर 
अवधि : 175 मिनट
रेटिंग : 2 स्टार 


  टॉयलेट एक प्रेम कथा जैसी अर्थपूर्ण और उद्देश्य पूर्ण फिल्म बनाने वाले श्री नारायण सिंह ने इस बार उत्तराखंड को केंद्र में रखकर निजी बिजली कंपनी द्वारा बिजली उपभोक्ताओं की परेशानियों और दिक्कतों को ध्यान में रखकर यह फिल्म बनाई है। यद्यपि उद्देश तो इसका भी अच्छा है लेकिन इस फिल्म में उन्होंने भाषा के साथ खिलवाड़ करके विश्वसनीयता खंडित की है जिसके कारण बनावटी पन और नकली पन ज्यादा दिखाई देता है।
     उत्तराखंड के टिहरी में रहने वाले तीन दोस्तों- सुशील कुमार पंत उर्फ एस के (शाहिद कपूर), ललिता नौटियाल उर्फ नॉटी (श्रद्धा कपूर) और सुंदर त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) तीनों बचपन के दोस्त हैं। एस के पेशे से वकील है लेकिन उसका काम है लोगों को धमका कर ब्लैकमेल करके पैसा कमाना। त्रिपाठी प्रिंटिंग प्रेस चलाता है और उन दोनों की कॉमन फ्रेंड है नॉटी। त्रिपाठी और नॉटी की नज़दीकियां एस के की दोस्ती में दरार पैदा कर देती हैं। त्रिपाठी अपनी कंपनी में 54 लाख के बिजली के अनाप-शनाप बिल आने से बेहद परेशान हो उठता है और एस के से मदद मांगने जाता है लेकिन एस के उसकी मदद नहीं करता। मायूस त्रिपाठी  आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। बाद में एस के को अपनी गलती का एहसास होता है और वह त्रिपाठी का केस लड़ता है जिसमें कोर्ट में उसका सामना होता है विरोधी पार्टी की वकील गुलनार यानी यामी गौतम से।
      इस फिल्म को बनाने का उद्देश्य बहुत नेक है कि किस तरह निजी कंपनियां अनाप-शनाप बिल भेज कर लोगों को मानसिक प्रताड़ना देती हैं और लोग आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाने को भी मजबूर हो जाते हैं। 
     इस फिल्म में निर्देशक ने उत्तराखंड की खूबसूरत लोकेशन को दिखाया है। यद्यपि  वहां ठहरा, बल, लाटा जैसे शब्द आम बोलचाल में प्रयुक्त होते हैं लेकिन केवल इन दो चार शब्दों को बोलने से कोई किरदार पहाड़ी नहीं हो जाता। फिल्म के पहले हाफ् में इन दो शब्दों- ठहरा और बल को निर्देशक ने इतना ज्यादा घिस दिया है कि वितृष्णा पैदा कर देते हैं और जो मुख्य समस्या को लेकर फिल्म बनाई थी वह मानो निर्देशक के दिमाग से गुल ही हो गई हो।  

        शाहिद कपूर इस फिल्म में मुख्य किरदार की भूमिका में है, जो ठीक लगे हैं। पहले हाफ् में जहां वह लापरवाह और हंसाते हैं वही फिल्म के दूसरे हाफ् में मनोरंजन करने के साथ-साथ हल्की गंभीरता भी उनके किरदार में दिखाई पड़ती है। श्रद्धा कपूर खूबसूरत तो है लेकिन उनको अपने अभिनय को निखारने में अभी बहुत मेहनत करने की जरूरत है क्योंकि केवल खूबसूरती से सफलता हासिल नहीं की जा सकती। वहीं दिव्येंदु शर्मा का काम बेहतरीन है।
   ऐसा लगता है कि जिस समस्या पर निर्देशक ने उंगली रखनी चाही है वह अचानक दिमाग की बत्ती गुल हो जाने के कारण पीछे छूट गई है और एक बेहद औसत दर्जे की फिल्म बनकर रह गई है। इसकी लंबाई भी बेहद खलती है। यदि निर्देशक ने ठहरा और बल को रबर की तरह इतना खींचा नहीं होता और स्वाभाविक रूप से अपनी बात कही होती तो यह फिल्म एक कामयाब फिल्म हो सकती थी।

साधना अग्रवाल
Asst Prof & Film Critic, Delhi University
Email: agrawalsadhna2000@gmail.com

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