घिसी—पिटी कहानी
फिल्म: सत्यमेव
जयते
निर्देशक:
मिलाप मिलन जावेरी
अभिनय:
जॉन अब्राहम, मनोज
वाजपेयी, आयशा शर्मा,
अमृता खनविलकर, नोरा
फतेही
संगीत: साजिद—वाजिद, तनिष्क बागची,
रोचक कोहली, आर्को
गीत: शब्बीर
अहमद, कुमार, आर्को
अवधि: 141 मिनट
सर्टिफिकेट: ए
रेटिंग: 1 स्टार
मस्ती,
ग्रैंड मस्ती और मस्तीजादे
जैसी कॉमेडी फिल्मों
की पटकथा लिखने
वाले मिलाप अब
अगर कोई एक्शन
फिल्म लिख रहे
हों तो उनसे
ज्यादा उम्मीद करना सही
नहीं है। बेहद ही
औसत फिल्में बनाने
वाले मिलाप की
यह फिल्म भी
बिल्कुल साधारण है। उन्होंने
वही घिसी—पिटी
कहानी को नए
कलेवर में डालकर
मसाला फिल्म तैयार
की है। इसमें
कुछ भी नया
नहीं है। पुलिस
महकमे में व्याप्त
भ्रष्टाचार को दिखाना
कोई नई बात
नहीं है। 80—90 के
दशकों में भी
इस तरह के
भ्रष्टाचार को दिखातीकई
फिल्में
बन चुकी हैं। जब
रक्षक ही भक्षक
बन जाए तो
उस समाज में
कैसे जिया जा
सकता है खासकर
पुलिसवाले को देखते
ही उस पर
भरोसा करने की
जगह उन पर
अविश्वास ही अधिक
होता है, इस
सच्चाई को यह
फिल्म पुखता ही
करती है।
फिल्म
की कहानी में
कोई भी आकर्षण
नहीं है। इसमें
एक ईमानदार पुलिसवाले
को आत्महत्या करनी
पड़ती है। पिता
की मौत की
बदला उसका बेटा
वीर (जॉन अब्राहम)
लेता
है लेकिन वह
बदला इस तरह
से लेता है
कि उससे सहानुभूति
नहीं होती। क्योंकि
वह भ्रष्ट पुलिसवालों
को जिंदा जलाता
है। उसका बड़ा
भाई शिवांश ( मनोज
वाजपेयी), जो खुद
एक ईमानदार डीसीपी
है, कातिल को
पकड़ने में दिन—रात एक
कर देता है।
उन दोनों के
बीच चूहे —बिल्ली
का खेल चलता
रहता है। वीर
का करप्सन में
लिप्त भ्रष्ट अधिकारियों
को जिंदा जलाना
उनके प्रति सहानुभूति
पैदा नहीं करता,
न ही उनसे
दर्शक जुड़ाव महसूस
करता है बल्कि
एक गलत संदेश
ही जाता है।
वीर
की भूमिका में जॉन
अब्राहम ने अपनी बॉडी
दिखाकर इम्प्रैस भी किया
है और काम
भी अच्छा किया
है। हालांकि यह
एक एक्शन फिल्म
है लेकिन कहीं
से भी विश्वसनीय
नहीं लगती। जैसे
अचानक वीर कहीं
भी प्रकट हो
सकता है, किसी
को भी मार
सकता है। चूंकि
वह एक कलाकार
भी है इसलिए
जिस—जिस पुलिस
वाले को मारता
है, उसकी तस्वीर
बनाता है। एक
तरफ तो वीर
करप्सन के खिलाफ
है तो दूसरी
तरफ वह खुद
कैरोसिन डालकर भ्रष्ट पुलिसवाले
को जिंदा जलाकर
मार डालता है
और कानून को
हाथ में लेकर
उसकी धज्जियां उड़ाता
है। मनोज वाजपेयी
एक बेहतरीन अभिनेता
हैं लेकिन पता
नहीं क्यों उन्होंने
इस फिल्म में
काम करना स्वीकार
किया। आखिर वे
किसके भरोसे अपने
अभिनय से फिल्म
को उंचाई तक
पंहुचाते ? आयशा शर्मा,
जो वीर की
प्रेमिका की भूमिका
में हैं, उनको
फिल्मों में काम
करने से पहले
अपनी भाषा पर
ध्यान देना होगा,
एक्टिंग तो बाद
की बात है।
इस
फिल्म को ग्लैमराइज्ड
करने के लिए
निर्देशक ने आइटम
नंबर दिलबर—दिलबर
डालकर फिल्म में
जान डालने की
कोशिश की है,
जबकि इस तरह
की फिल्मों में
इसकी जरुरत नहीं
होती। संभवत: पहले
ही उनको इस
फिल्म की कमजोरियों
का पता होगा।
पानियों सा गाना
ठीक लगता है।
यह
एक औसत दर्जे
की एक्शन फिल्म
है जो करप्सन
के खिलाफ है।
हां इसके कुछ
संवाद बहुत अच्छे
लगते हैं जिस
पर दर्शकों की
सीटियां भी सुनाई
पड़ती हैं और
तालियां भी। जैसे
एक सीन में
मनोज वाजपेयी कहते
हैं कि कानून
को हाथ में
लेने का हक
सिर्फ कानून के
लोगों को होता
है। लेकिन शायद
फिल्मकारों को एक
भ्रम यह भी
है कि यदि
फिल्म को लंबा
बना दिया जाए
तो उनका नाम
होगा लेकिन कामयाब
होने के लिए
फिल्म की लंबाई
नहीं, उसकी कहानी
पर मेहनत की
जानी चाहिए। यही
कारण है कि
यह फिल्म भी
अपनी अतिरिक्त लंबाई
के कारण भी
बोर करती है।
—साधना अग्रवाल


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