यह मुल्क 'हमारा ' है
फिल्म : मुल्क
निर्देशक : अनुभव सिन्हा
अभिनय: ऋषि कपूर, तापसी पन्नू, आशुतोष राणा, प्रतीक बब्बर, मनोज पाहवा, नीना गुप्ता, प्राची शाह, रजत कपूर, अश्रुत जैन
संगीत : अनुराग सैकिया, प्रशांत साशते
गीत : शकील आज़मी
रेटिंग : 4 स्टार
अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म 'मुल्क' यह बताने में कामयाब रही है कि यह मुल्क 'हमारा' है। मतलब जितना हिंदुओं का, उतना ही मुसलमानों का भी। लेकिन कुछ कट्टरवादी लोग इस मुल्क को धर्म के आधार पर दो हिस्सों में बांटने की कोशिश करते रहे हैं। यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि केवल हिंदू ही अपने देश से प्रेम कर सकते हैं। दिक्कत यह है कि लोग बड़ी आसानी से मुसलमानों को आतंकवादी या देशद्रोही साबित करने में लग जाते हैं।
कहा भी गया है पाप से घृणा करो, पापी से नहीं, यही संदेश यह फिल्म देती है। हत्यारा आखिर हत्यारा होता है। वह न हिंदू होता है और न मुसलमान। लेकिन यहां यह सवाल उठता है कि एक इंसान के अपराधों की सजा उसके निर्दोष परिवार को देना क्या उचित होगा ?
भारत में अनेक भाषाओं को बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। आज भी बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक लोगों के बीच का फर्क साफ दिखाई देता है। आज के उत्तर आधुनिक समय में भी यदि कोई मुसलमान पड़ोसी रहता हो तो हम न जाने क्यों उसे सहज रुप से अपना नहीं पाते और कहीं न कहीं असुरक्षा की भावना दोनों के दिलों में घर कर लेती है।
इस फिल्म में एक संयुक्त मुस्लिम परिवार रहता है। परिवार के मुखिया मोहम्मद मुराद अली (ऋषि कपूर) हैं, जो बेहद सम्मानित व्यक्ति हैं। उनसे जितना प्यार मुसलमान दोस्त करते हैं उससे कहीं ज्यादा हिंदू दोस्त। उनके परिवार में उनकी पत्नी तबस्सुम (नीना गुप्ता), छोटा भाई बिलाल मोहम्मद (मनोज पाहवा), उनकी पत्नी छोटी तबस्सुम (प्राची शाह), बेटा शाहिद (प्रतीक बब्बर) और एक बेटी है। तथा मोहम्मद मुराद अली का एक बेटा है, जो विदेश में रहता है। और उसकी पत्नी आरती (तापसी पन्नू) हिंदू है। मुराद अली और उनका पूरा परिवार अपनी बहू को बहुत प्यार करते हैं। बिलाल मोहम्मद का बेटा शाहिद गलत रास्ते पर चल पड़ता है और एक आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण मारा हंस जाता है। यूं तो यह परिवार एक खुशहाल परिवार है और सभी आपस में बहुत प्रेम से और मिलजुल कर रहते हैं लेकिन शाहिद के मारे जाने के बाद, इस परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। मुराद अली के सामने संकट यह है कि वह अपने देश प्रेम को साबित कैसे करें ? या इसके लिए प्रमाण कैसे पेश करें? यह काफी मुश्किल है क्योंकि इसको प्रमाणित नहीं किया जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है। यही इस फिल्म का मुख्य कथ्य है। हमारे कुछ ऐसे पूर्वाग्रह होते हैं कि हम बिना सोचे समझे ही केवल धर्म की आड़ में निर्दोष को भी दोषी समझने लगते हैं। हम आतंकवाद को धर्म से बड़ी आसानी से जोड़ देते हैं और यह मान लेते हैं कि हर आतंकवादी मुसलमान हैं, जो कि सच नहीं है।
यह फिल्म जहां एक ओर अपने संदेश को बखूबी दिखाती है, वहीं दूसरी ओर इसके सभी किरदारों ने अपने बेहतरीन अभिनय से इसे कामयाबी के शिखर पर पहुंचा दिया है। ऋषि कपूर मुस्लिम संप्रदाय के एक देशभक्त के रूप में खूब जंचे हैं। उनके अभी तक का बॉलीवुड का अनुभव इस फिल्म में भी दिखाई देता है। तापसी पन्नू जो पहले 'पिंक' और अभी कुछ ही पहले आई 'सूरमा' में अपने अभिनय से बॉलीवुड में अपनी एक खास जगह बनाने में सफल रही हैं, इस फिल्म में वह एक हिंदू लड़की के रोल में हैं, जो मुराद अली की बहू है। वह पेशे से वकील हैं और कोर्ट रूम के पूरे ड्रामे में उन्होंने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। मनोज पाहवा बिलाल मोहम्मद के रूप में एक बेहतरीन और उम्दा कलाकार के रूप में दिखाई दिए हैं। वे एक तरफ मुराद अली के छोटे भाई के रूप में उन से बेहद प्रेम करते हैं और दूसरी तरफ अपने बेटे की गद्दारी के कारण सजा भुगतने हैं और पश्चाताप करते हैं। आशुतोष राणा कोर्ट रूम में सरकारी वकील हैं, जैसा कि भारतीय जनमानस के मन में मुसलमानों के प्रति जो दुराग्रह घर किए हुए हैं, उनको तो सामने लाते ही हैं, साथ में मनोरंजन भी भरपूर करते हैं। रजत कपूर जो एक एंटी टेरेरिस्ट स्क्वॉड के अधिकारी के रुप में हैं। वह खुद एक मुसलमान होते हुए भी अपने मुल्क से प्यार करते हैं। वे आतंकवादी शाहिद को गोली मारने से जरा भी नहीं हिचकते। शाहिद के रूप में प्रतीक बब्बर और राशिद के रोल में अश्रुत जैन ने अपने -अपने किरदारों को बखूबी निभाया है। बाकी भी सभी सह-कलाकारों का काम भी सराहनीय है।
इस फिल्म का संगीत कमजोर है लेकिन बैकग्राउंड स्कोर इसका ठीक है। कुल मिलाकर कहें तो लगभग ढाई घंटे की यह फिल्म दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखती है, कहीं भी ढील नहीं छोड़ती। यह हमारी आंखें कभी नम करती है, तो कभी मन में बेहद गुस्सा भी आता है कि आखिर हम कौन से समाज में जी रहे हैं। मेरे दृष्टिकोण में आज के समय को और आज की परिस्थितियों को जानने के लिए यह फिल्म जरुर देखी जानी चाहिए।
-साधना अग्रवाल
Assistant Professor and Film Critic, Delhi University
Email: agrawalsadhna2000@gmail.com
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