मीडिया को प्रश्नचिन्ह के घेरे में लाती फिल्म संजू


फिल्म संजू 
निर्देशक - राजकुमार हिरानी 
अभिनय  - रणबीर कपूर, परेश रावल, मनीषा कोइराला, सोनम कपूर, विक्की कौशल, दीया मिर्जा, अनुष्का शर्मा आदि 
संगीत - विक्रम माॅनट्रोसे,  रोहन, ए आर रहमान 
गीत - शेखर अस्तित्व ,पुनीत शर्मा, रोहन गोखले ,इरशाद कामिल 
अवधि -162 मिनट 
रेटिंग - 4 स्टार
इधर जिस तरह साहित्य में कथेतर गद्य की ओर पाठक आकर्षित हो रहे हैं मसलन आत्मकथा या जीवनी की ओर, उसी तरह बायोपिक फिल्मों का क्रेज भी बढ़ता जा रहा है। क्योंकि किसी लेखक की रचना को पढ़ना और उस लेखक को अपने सामने पाना, उसे देखना और उसके साथ होना, अवसर मिले तो उस लेखक की सोच और रचना पर एक ईमानदार और जिज्ञासु संवाद करना, एक भिन्न और रोमांचक अनुभव होता है। कई भ्रम दूर होते हैं। वास्तविकताओं को जानना कभी अच्छा होता है और कई बार बुरा भी। इसी तरह जब हम कोई बायोपिक फिल्म देखते हैं तो दूसरी फिल्मों की अपेक्षा ऐसी फिल्में हमें कभी हौसला देती हैं और कभी प्रेरणा। यूं तो काफी पहले से बायोपिक फिल्में बनती रही हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसी फिल्मों का क्रेज कुछ ज्यादा बढ़ा है। ऐसी फिल्मों में हम भाग मिल्खा भाग ,मैरी कॉम ,नीरजा ,अलीगढ़, अजहर, एम एस धोनी:  द अनटोल्ड स्टोरी, सरबजीत, दंगल आदि का नाम ले सकते हैं। इस क्रम में अब राजकुमार हिरानी ने संजय दत्त की आत्मकथा को पर्दे पर उतारने की हिम्मत की है।
          राजकुमार हिरानी, विधु विनोद चोपड़ा और अभिजात जोशी की तिकड़ी एक बार फिर बड़े पर्दे पर उतरी है और उसने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। मुन्नाभाई सीरीज से बुलंदियों पर संजय दत्त को ले जाने का श्रेय काफी हद तक हिरानी को दिया जा सकता है, शायद इसीलिए जब संजय दत्त की बायोपिक फिल्म बनाने की बात हो तो हिरानी से बेहतर शायद बाबा को और कौन जान सकता है।
        क्योंकि यह फिल्म संजय दत्त की आत्मकथा पर आधारित है तो जाहिर है कि हमें उनकी जिंदगी के उतार चढ़ाव देखने के लिए मिलते हैं । संजू की पत्नी मान्यता दत्त( दीया मिर्जा) संजू की कहानी लिखने के लिए एक बहुत बड़ी लेखिका विनी (अनुष्का शर्मा) को राजी कर लेती है क्योंकि वह चाहती है कि संजू  (रणबीर कपूर) की जिंदगी का असली सच लोगों के सामने आए ना कि वह, जो अखबारों ने मनगढ़ंत खबरें छापकर संजू को बदनाम कर दिया था। संजू विन्नी को बताता है कि कैसे उसके एक दोस्त ने उसे ड्रग्स की अंधेरी दुनिया में धकेल दिया था और किस तरह उसके दूसरे दोस्त कमलेश (विकी कौशल) ने उसे इस अंधेरी दुनिया से निकाल रोशनी की राह दिखाई थी। किस तरह उसके पिता सुनील दत्त (परेश रावल) ने हर परेशानी में उनका साथ दिया लेकिन उसे अफसोस है कि वह उनका शुक्रिया अदा नहीं कर पाया क्योंकि एक रात पहले ही वह इस बेरहम दुनिया से कूच कर गए थे। गीतों के माध्यम से कैसे उसके पिता सुनील दत्त उसको प्रेरित किया करते थे। साथ ही इस फिल्म में मीडिया के ऊपर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाया गया है कि कैसे मीडिया एक इंसान की जिंदगी बदल देता है। अपने उत्तरदायित्व से बचने के लिए मीडिया जानबूझकर अपनी खबरों में प्रश्नचिंह लगा देता है और बिना सच्चाई जाने वह अपना फैसला सुना देता है जब कि फैसला सुनाने का काम उसका नहीं , न्यायाधीश का होता है। इसमें एक जगह संजू कहते भी हैं कि समाचार ड्रग्स होते हैं , क्योंकि उनकी जिंदगी में मीडिया की जो भूमिका रही है उससे वे खासे नाराज रहे हैं ।
       इस फिल्म को रणबीर कपूर के जीवन की सबसे बेहतरीन फिल्म कहा जा सकता है क्योंकि इसमें उन्होंने कड़ी मेहनत की है। खुद को उन्होंने बिल्कुल संजय दत्त के रूप में ढाल लिया है ,चाहे वह उनके चलने फिरने का ढंग हो या बोलने का। यही कारण है कि फिल्म के अंत में एक गाने में असलियत में रणवीर कपूर के साथ जब संजय दत्त आते हैं तो भी दर्शक संजय दत्त को ना देखकर रणवीर कपूर को ही देखना चाहता है। यह फिल्म उन्हें फिल्मी इतिहास में अमर करने के लिए काफी है। हां भविष्य में अब उनको अपनी ही सीमा रेखा पार करनी होगी जो उनके लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है। इस फिल्म के बाद अब यह  कहने में कोई संकोच नहीं कि वे एक सुपरस्टार हैं ।सुनील दत्त की भूमिका में परेश रावल का काम भी काबिले तारीफ है वैसे भी परेश एक मंझे हुए कलाकार हैं। संजू के दोस्त बने कमलेश की भूमिका में विकी कौशल ने अपने दमदार अभिनय से यह साबित कर दिया है कि वह एक बेहतरीन कलाकार हैं । बाकी कलाकारों का काम भी सराहनीय है।
       इस फिल्म के माध्यम से सुनील दत्त ने यह बताने की कोशिश की है कि गीतकारों की एक अहम भूमिका होती है और कैसे कोई गीत हमारी प्रेरणा बन सकता है। इस फिल्म में भी कुछ गाने अच्छे लगे हैं जिनमें 'कर हर मैदान फतेह' तो लोगों की जुबान पर चढ़ ही गया है।
         राजकुमार हिरानी ने इस फिल्म को 21 साल के संजू की जिंदगी से शुरू कर उनके अब तक के सफर को मात्र पौने तीन घंटे में फिल्मी पर्दे पर उतार कर अपने उम्दा निर्देशन का प्रमाण दिया है। इस दरमियान दर्शक इतना खो जाता है कि फिल्म कब खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता। कहा जा सकता है कि यह फिल्म ना केवल संजय दत्त की अपितु राजकुमार हिरानी की या फिर विधु विनोद चोपड़ा और अभिजात जोशी की बल्कि रणबीर कपूर के जीवन में भी एक मील का पत्थर साबित होगी।
     हालांकि बायोपिक फिल्में बनाना आसान तो नहीं लेकिन सुपरिचित कवि नरेश मेहता के शब्दों में - "सीढ़ियां तो / केवल खड़े होने के लिए होती हैं /जबकि अवगाहन/ सीढ़ीहीन संपूर्ण समर्पण मांगता है।"




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