राजनीतिक महत्वाकांक्षा की जिद
फिल्म : साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3
निर्देशक: तिग्मांशु धूलिया
अभिनय : संजय दत्त, चित्रांगदा सिंह, माही गिल, जिमी शेरगिल, सोहा अली खान, नफीसा अली, कबीर वेदी, दीपक तिजोरी
संगीत: सिद्धार्थ पंडित,आंजन भट्टाचार्य, राणा मजूमदार
गीत : रेवंत शेरगिल, कुमार, राजा मेहदी अली, कौसर मुनीर
अवधि : 140 मिनट
सर्टिफिकेट : A
रेटिंग : 1 स्टार
यह फिल्म साहेब, बीवी और गैंगस्टर (2011) और (2013) में आई फिल्मों का सीक्वल है। हालांकि सीक्वल फिल्मों का चलन पिछले कुछ वर्षों में ज्यादा बढ़ा है, लेकिन मुझे लगता है कि इससे फिल्मकारों को तो सहूलियत होती है लेकिन दर्शक अपने को ठगा सा महसूस करता है। क्योंकि यह कोई एकता कपूर का टीवी सीरियल नहीं कि कहानी कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती और जिसे बेवजह घसीटा जाए। कुछ-कुछ वही हथकंडा फिल्मकार भी अपनाने लगे हैं और क्रमशः दर्शकों को सजा देते हैं। कुछ नया करने की जगह वही पुरानी घिसी-पिटी कहानी को नये मिश्रण में लपेटकर परोस दिया जाता है।
यह एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा की फिल्म है, जिसमें दिखाया गया है कि यदि एक पुरुष बेवफाई कर सकता है तो औरत भी इससे कोई परहेज नहीं करती। सत्ता सुख के आगे उसे उचित अनुचित का नहीं, बल्कि अपने पद, सुख, ऐशो-आराम का ध्यान ज्यादा होता है।
तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन में बनी यह फिल्म निराश ही ज्यादा करती है। अब फिल्मकारों को अपनी यह गलतफहमी छोड़नी होगी कि कुछ बोल्ड सीन दिखा कर वे लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं। यह वही तिग्मांशु धूलिया हैं, जो 'पान सिंह तोमर' जैसी फिल्म बना चुके हैं।
फिल्म की कहानी पिछली सीरीज से आगे बढ़ती है, जिसमें राजस्थान के बूंदीगढ़ के 'साहेब' आदित्य प्रताप सिंह (जिमी शेरगिल) जेल में है और 'बीवी' माधवी देवी (माही गिल) राजसत्ता का सुखोपभोग कर रही हैं। माधवी देवी पति की अनुपस्थिति में खूब मौज मस्ती करती हैं। एक दूसरी रियासत के युवराज उदय प्रताप सिंह (संजय दत्त) लंदन में रहते हैं, जबकि उनका पूरा परिवार पिता (कबीर बेदी), मां (नफीसा अली), भाई (दीपक तिजोरी) और प्रेमिका सुहानी (चित्रांगदा सिंह) भारत में ही रहते हैं। उदय जब भारत आता है तो माधवी से उसकी नजदीकियां बढ़ जाती हैं। इसी बीच आदित्य प्रताप सिंह भी जेल से छूट जाता है और उदय और आदित्य का आमना- सामना होता है।
पूरी फिल्म में जिमी शेरगिल और माही गिल ही अपने -अपने किरदार को सही से निभाते हैं, चूंकि उनकी लाइन्स और स्क्रिप्ट घिसी-पिटी थी इसलिए फिल्म को ज्यादा सपोर्ट नहीं दे पाते। वही संजय दत्त राज परिवार के नहीं बल्कि कोई टपोरी, सड़कछाप गैंगस्टर ज्यादा लगे हैं। चित्रांगदा सिंह को इस फिल्म में क्यों लिया गया, समझ नहीं आता, क्योंकि उनका कोई रोल नहीं था, केवल एक गाने और कुछ बोल्ड सींस के लिए उनका इस्तेमाल किया गया है। सोहा अली खान साहेब की दूसरी बीवी होने के बावजूद पूरे ढाई घंटे की फिल्म में चंद मिनट ही दिखाई देती हैं। बाकी सह-कलाकार - कबीर बेदी, दीपक तिजोरी, नफीसा अली भी कुछ करते नजर नहीं आते, सिवाय दर्शकों को कंफ्यूजड और वोर करते हैं ।
इस फिल्म में 'लग जा गले' गाना,जिसे लता जी ने गाया था, इसमें रीमिक्स बनाकर पेश किया गया है, जिसे देखकर लगता है कि उसकी आत्मा ही मानों छीन ली गई है। संजय दत्त और चित्रांगदा सिंह पर फिल्माये गाने की कोई जरूरत नहीं थी। इसका गीत संगीत बिल्कुल औसत दर्जे का है।
मेरा सुझाव है कि इस फिल्म को देखने से बेहतर यदि दर्शक अपने पैसे और समय खर्च करना ही चाहते हैं तो इस बारिश के मौसम में गरमा- गरम चाय और पकोड़े खा कर मजा लें, नहीं तो सिरदर्द दूर करने के लिए आपको अतिरिक्त दवा की जरूरत होगी।
-Dr. Sadhna Agrawal
Assistant Professor, Delhi University & Film Critic
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