प्यार में पड़ा सनकी प्रेमी

                             


                            प्यार में पड़ा सनकी प्रेमी

फिल्म : कबीर सिंह
निर्देशक : संदीप वांगा रेड्डी
अभिनय : शाहिद कपूर, कियारा आडवाणी, सोहम मजूमदार, सुरेश ओबेरॉय, कामिनी कौशल, अर्जन बाजवा
संगीत : मिथुन शर्मा, अमाल मलिक, विशाल मिश्रा
गीत : इरशाद कामिल
अवधि : 174 मिनट 
रेटिंग : ⭐⭐                                   
                                 



            यह फिल्म संदीप वांगा रेड्डी के निर्देशन में ही बनी तेलुगु फिल्म अर्जुन रेड्डी की रीमेक है। बस इसे उन्होंने इसे हिंदी भाषा में बनाया है इसलिए इसमें नया कुछ भी करने के लिए नहीं है। पूरी फिल्म कबीर सिंह यानी शाहिद कपूर की है। कबीर एक होनहार मेडिकल स्टूडेंट है लेकिन बेहद गुस्सैल। यही नहीं वह औरत को अपनी प्रौपर्टी समझने वाला इंसान है। उसे अपनी भावनाओं को कंट्रोल करना आता है ही किसी की इज्जत करना। वह बेहद कामुक और वासनायुक्त है। वह तरहतरह के नशे का आदी है।

          कबीर सिंह दिल्ली के मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है और वहां का टॉपर भी रहा है। इसके अलावा उसमें कोई खासियत नहीं है। क्योंकि वह बेहद गुस्सैल है। यहां तक कि एक फुटबाल मैंच के दौरान वह लड़ाईझगड़ा भी करता है और अपने प्रतिद्वंद्वी को बुरी तरह से पीटता है जिसकी वजह से उसे कॉलेज से निकालने की नौबत भी जाती है। लेकिन तभी उसकी नजर फर्स्ट इयर स्टूडेंट प्रीति पर पड़ती है और मन ही मन वह उससे प्यार करने लगता है और वापस कॉलेज में रहने का फैसला करता है। वह प्रीति को अपनी बंदी कहना शुरू कर देता है। वह उस पर अपना इस तरह हक जमाता है जैसे वह कोई रबड़ की गुड़िया हो। जहां चाहे, जब चाहे उसे किस कर देता है, अपने होस्टल में रहने के लिए ले आता है, उसको पढ़ाने का नाटक करता है, पीछे मोटरसाइकिल पर बैठाकर घुमाने ले जाता है। और प्राति भी बिना किसी नाजनखरे के उसके साथसाथ चल पड़ती है। उसे देखकर लगता ही नहीं कि वह आज की लड़की है। कबीर प्रीति का हाथ मांगने जब उसके घर पहुंचता है लेकिन प्रीति के घरवाले इस शादी के लिए मना कर देते हैं। यहां तक कि प्रीति की शादी किसी और से कर देते हैं। कबीर नहीं सुन पाता और रातदिन नशे में डूब जाता है। कबीर के पिता उसे अपने घर से निकाल देते हैं। कबीर केवल नशा ही नहीं करता, उसे हर रोज अपनी वासना को मिटाने के लिए एक लड़की चाहिए होती है जिसका इंतजाम उसके दोस्त करते हैं।

        इस फिल्म में कहीं से भी दर्शक खुद को जोड़ नहीं पाता, ही किसी से हमदर्दी हो पाती है। कबीर सिंह से तो बिल्कुल भी नहीं। और तो और प्रीति पर भी गुस्सा आता है कि वह चुपचाप कबीर की बदतमीजी को आखिर क्यों सहती है? लगता ही नहीं कि वह एक पढ़ीलिखी आधुनिक लड़की है। यह बात भी समझ नहीं आती कि आखिर कबीर की बदतमीजियों को आखिर सब चुपचाप क्यों सहते हैं? उससे डरने का कारण भी दिखाई नहीं देता। कबीर एक ऐसा सनकी प्रेमी है जो लड़की को केवल हासिल करना चाहता है और कुछ नहीं। ताज्जुब तो कई बार होता है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि अस्पताल के लोग भी कबीर के सामने डरेदबे दिखाई देते हैं। यही नहीं वह नशे की हालत में सर्जरी भी करता है और कभीकभी तो वह केवल निर्देश ही दे देता है क्योंकि वह नशे में होता है।
                               
          फिल्म में कबीर की प्रेम कहानी दिखाई गई है लेकिन प्रेम में गर्माहट, रोमांच, बेकरारी , सिहरन, भावुकता, आत्मीयता, इंसानियत सिरे से गायब है। हां कबीर सिंह के रोल में शाहिद कपूर ने खुद को इस तरह ढाल लिया है कि उसे देखकर उससे प्यार नहीं जुगुप्सा ही ज्यादा होती है। हो सकता है कि यह फिल्म ऐसे लोगों को अच्छी लगे जो एक पुरुष होने के कारण खुद को खुदा समझते हों कि वह जो चाहें कर सकते हैं। वह किसी पर भी अपना हक जमा सकते हैं लेकिन अपनी भावनाओं को काबू में नहीं कर सकते। औरत की इज्जत करना तो दूर, वह उसकी तुलना एक जानवर से करते हैं तभी तो कबीर को भी जब प्रीति नहीं मिलती तो वह एक कुत्ता पाल लेता हे और उसका नाम प्रीति रख देता है। इस फिल्म में कबीर को एक होनहार डाक्टर तो दिखाया गया है लेकिन क्या सचमुच कोई व्यक्ति ऐसे गुस्सैल डाक्टर से अपना इलाज कराना चाहेगा जिसको अपने गुस्से पर कंट्रोल है और अपनी कामवासनाओं पर।  प्रीति की भूमिका में कियारा आडवाणी के चेहरे पर कोई भाव दिखाई नहीं देता, लगता है कि एक निर्जीव सी गुड़िया है जिसे जिधर चलने को कहा जाए,चल देगी। कबीर के भाई के रोल में अर्जन बाजवा और उसके दोस्त की भूमिका में सोहम मजूमदार जरूर अच्छे लगते हैं और दर्शकों को उनसे हमदर्दी भी होती है।

            गीतसंगीत भी बेहद साधारण हैं। बस एक गाना 'बेख्याली' जरूर अच्छा लगता है।  



-© Dr Sadhna Agrawal
Film Critic & Asst Prof. 
Delhi University
             

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